भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९३० )

बोधसागर

२२

मैं हो आदि मध्य अरु अन्ता । मोहि फुराफुर वेद बदन्ता ॥ पक्की तत्त्व देह जब पावै । तबनिजुघरजिव बहुरिके आवै ॥ पक्की तत्त्व प्रकृत पच्चीसा । स्वसंवेदकी विधि जो दीसा ॥ ताको गह कच्चीको त्यागे । ऐसे योग युक्तिमें लागे ॥ तनकी कृपा योग अष्टंगा । ताको तज भज मनको अंगा ॥ मन अष्टांग योग उरधारो । स्वसंवेद जाको निरधारो ॥ तनकी कृपाकाज नहीं सरही । मन करनी जिवपार उतरही ॥ मनको रचित सकल संसारा । हो निवृत्त जिव मनके द्वारा ॥ तन मन यद्यपि मिथ्या दोई । मन करनी अति उत्तम होई ॥ तन है जाय आपनी बसमें । जेहि औसरआवै मन कसमें ॥ तन मन दोनों बश है जाई । तब निज रूप नजरमें आई ॥ ऐसे साधु जो जगमें आही । हरि ब्रह्म शिव ध्यावै ताही ॥ ताकी गतिको सके बखानी । लखे न शारद वेद अरु बानी ॥

मौनीजि वचन विचार माला

दोहा—स्वसंवेद नहीं कहि सके, लक्षण सन्त महन्त । परसंवेद कहे कष्ट, संग प्रताप कहंत ॥

चौपाई

जिनकी गति अगम अगाधू । बानी वेद पारसो साधू ॥ स्वसंवेद गुण तासु न कहई । तिनको भेद जीव किमि लहई ॥ समदृष्टि सो साधू ऐसे । सोई ब्रह्म रूप मैं पैसे ॥ काहू नहीं सो दुःख दुःखावै । जिनकी दृष्टिमें साहेब आवै ॥ को हिन्दू को मुसलमाना । को ब्रह्म केहि श्रद्ध बखाना ॥ कौन यहूदी कौन नसारा । एकै ब्रह्मको सकल पसारा ॥ रह्यौ चराचरमें सो पूरी । जाहि लखे हो सब दुःख दूरी ॥ आप आप लख ब्रह्म सनेही । जहाँ तहाँ देखो नेरी देही ॥