कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
(१९३१)
मोहितजिऔर कतहु कोइनाही । अमकरि भिन्न भाव दरसाही ॥ मेरो मन अरु तन सब मेरो । तनमें मन मनमें प्रभु डेरो ॥ लखे अलखगति झगरा टूटा । जीव काल बंधनते छूटा ॥ अपनी देह सकल जग जानी । ताते सबहीको सनमानी ॥ काहूको नहीं करे निरादर । सब कोइ ओढ़े मेरी चादर ॥ स्वर्ग नरक मृत आपै आपा । जैसो कर्म तहां ले थापा ॥ सबदिल महल वहां प्रभुको है । आपै आप सर्वमें सोहै ॥ काहूको अनभल नहीं ताका । निजु अनभल ताते परिपाका ॥ औरको अनभल ताके जोई । अनभल अवश्य ताहिको होई ॥ एक मोगल क्रमकरे जो बनियां । तेहिदिग रह यक वैललदनियां ॥ मोगल परोसी धोबी रहई । लादनको एक गदहा गहई ॥ जिमि औसर खर करे पुकारा । मोगल दुखित होय तेहिबारा ॥ प्रभुसे नीति अस विनय उचरई । यहि धोबीको गदहा मरई ॥ यकदिन ऐसे कारन भयऊ । वैल मोगलको तब मरि गैऊ ॥ तिहि औसर मोगल गहि रोषा । परमेश्वरहि लगावै दोषा ॥ केते काल खुदाई कीना । गदहा बैल अजौ नहीं चीन्हा ॥ ऐसेहि सकल जीव अज्ञानी । प्रभु कह दोष लगावहि प्रानी ॥ सो नहीं दोष लगावन योगा । सबजिवनिजु२क्रमफल भोगा ॥ परभल किये भला हो अपना । निश्चय यह प्रमाण करिथपना ॥ जो काहूको कछु दुःख देई । सो दुःख अवश्य आप शिरलेई ॥ जो सबला अबला दुःखदानी । सो दुख अपने सिरपर आनी ॥ मांसरुधिर जिन जाको चाखा । परगल काटि आपसुख राखा ॥ औरकोशिरनहिनिजु शिरकाटा । अपनो तनकर बारह बाटा ॥ कोटिन यतन करे किन कोई । बदला अमिट छुटै नहीं सोई ॥