भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९३२ )

बोधसागर

२४

सत्यकबीर वचन-शब्द

अपनो कर्म न मेटो जाई । कर्मको लिखा मिटै घौँ कैसे जो युगकोटि सिराई ॥ गुरु वशिष्ठ सुनि लगन सोधाई सूर्य मंत्र यकदीना । जो सीता रघुनाथ विवाही पलयक संचन कीना ॥ तीन लोकका करता कहिये बालि बध्यौ बरि पाई । एक समय ऐसी बनि आई उनहू औसर याई ॥ नारदसुनिको बदन बिगान्यौ कीन्है कपिको रूप । शिशुपालकी भुजा उखारी आप भये हरि टूँटा ॥ पारवतीको बांझ न कहिये ईश न कही भिखारी । कहै कबीर करताकी बातें कर्मकि बात है न्यारी ॥

चौपाई

मेरो कर्म मोहि दुःख देता । जाने बिना भये वश प्रेता ॥ बदला भोगे आदि भवानी । बदला हरि हर अयशि आनी ॥ बदलाके कारन जिव झारी । भोगे दुःख भये संसारी ॥ दिल दुःखाव मति काहू कैंरो । सब तन अपने तन सम हेरो ॥ सबको दुःख सुख एक समाना । एकै रूप रूप सब जाना ॥ एकै रूप अनेक बरन है । एकै इन्द्री एकै तन है ॥ मनु सतरूपा वेदमें कहेऊ । सोई सकल रूप निजु गहेऊ ॥ चौरासी लख योनि उपानी । एकै अंग न और बखानी ॥ सबमें रमा सो अकथ अनूपा । सबको जानो मनु सतरूपा ॥ मनु सतरूपा आपै साहेब । देखि परे जगमें नाना ढब ॥ आदि पिता सबजग जिन हेरा । सो समदृष्टी सन्त बडेरा ॥ निर्वासनिक आदि ओंकारा । हिरनगर्भ वासना जो धारा ॥ भई वासना जगको कारन । दोय स्वरूप कीन तब धारन ॥

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