कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( ११२९ )
तेहि सर्वथा अभाव जो कीजै । तब कैसे निज देह धरिजै ॥ पै अभाव कीजै गुरु द्वारे । तब जिव अपनो काज सँवारे ॥ पुत्र अकाशको बायू होऊ । पिता समान शून्य है सोऊ ॥ बायू बेटा अग्नि बखानी । सो तद्रूप तातके जानी ॥ तासुत जल जलते यह धरनी । ये सब सन्न एक सम उरनी ॥ शून्य अकाश शून्य तिहु गुन है । तम अरु अहंकार सब सुन है ॥ पुत्र पिता परपिता सहीते । सर्व सुन कहु सार न चीते ॥ शून्यको रचित देह यह अहई । शून्य सर्वथा ताको कहई ॥ शून्यकि कृपा सूत्र सब जानो । शून्य सर्वसंसारहि मानो ॥ तन मन धन सब शून्य बताओ । नाम रूप गुन शून्य कहाओ ॥ सो तन मन धन गुरुको दीना । नाम तासु बदले गहि लीना ॥ शून्य जो दीना शून्यहि लीना । कहो कहा कारज निज कीना ॥ शून्यहि दीन जो सूत्रहि पाया । तेहि व्योहार हाथ क्या आया ॥ है परंतु कारण तह एका । तामैं लहो भिन्न कछु लेखा ॥ निश्चय नामहु शून्य विचारी । तामैं है कारज यक भारी ॥ नाम डोरि हटु गहि जो कोई । शून्य पार पथ पावै सोई ॥ शून्यकि पारपंथ जब पावत । बहुरि शून्यमें सो नहि आवत ॥ शून्य रूप भवसागर धारा । अंड पिंड सब शून्य सँवारा ॥ अमकरि शून्यमें खल प्रकाशो । जस मृगजल मरुथलमें भासे ॥ फेन बुदबुदा वारि तरंगा । वायु प्रसंग बनावहु ढंगा ॥ जेहि औसर वायू नहि चलही । गलके सकल मिले तोह जलही ॥ जल विकार सब जलहै जैसे । माया ब्रह्म जीव यक तैसे ॥ अम करि नाम धरे बहु डोरा । एकब्रह्म तजि कतहु न औरा ॥ जेहि औसर जिव सोलखि पावै । एकै माह अनेक समावै ॥ दृश्य अनेक जो एक समई । पिंड अंडकी थाह सो पाई ॥ थाह पाय जब जीव थिरोना । तब जान्यौ हो चारु चिरोना ॥
नं. ११ बोधसागर - ६