भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 2006, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2006

( १९२८ )

बोधसागर

२०

क्यों नहीं चिन्तामनि चित्चीत । यह दुनिया मतलबकी मीत ॥ जठर अग्निते तेहि जो बचाय । काहे ताको दियो भुलाय ॥ महा दुःख जब घरे आय । संकटमें सो करे सहाय ॥ भजु तेहि जन्म सुफल है जाय । परमहंसकी पदवी पाय ॥ ताकी कृपा चलो यमजीत । यह दुनिया मतलबकी मीत ॥

इति मोह

अथ भयवर्णन चौपाई

पंचम भय बटमार बड़ेरा । जो गहि जीव नरकमें गेरा ॥ भयवश तपी न जपतपकरहीं । भयते कायर घरमें मरही ॥ भय करि शूरा करे न करनी । भय करि सती न अग्निमें जरनी ॥ भय कीने शुभ कर्म न होई । भय करि शुभगति लहै न कोई ॥ भयकरि विद्याबुद्धि की हानी । भय भ्रम करि भमें चहुँखानी ॥ पांच वर्षका वय ध्रुव पाया । तप कारन सो वनाहँ सिधाया ॥ मिले ताहि नारद ऋषिराया । विविधि भांतिसे भय दिखलाया ॥ कानन महाभयावन कहेऊ । ध्रुवके हृदय न भय कछु गहेऊ ॥ बनमें जाय गूढ़ तप ठानी । रंच न सो मनमें भय मानी ॥ तपकरि हरिहि लियो प्रकटाई । धन्य धन्य ध्रुव धन्य कहाई ॥ जिनको हृदया भयते पूरा । तिनमें कबहुँ न साहस जूरा ॥ दोहा—पंचप्रकृति आकाशकी, कीने कछुक बखान । एकते एक महाप्रबल, सकल नरककी खान ॥

इति भय

चौपाई

पंच प्रकृत आकाश बखानो । पंच बहुरि बागूको जानो ॥ पंच अग्नि जलकी है पांचो । धरती पंच प्रकृति उर जांचो ॥ यही जीवको बंधन करही । इनहींते देही थित धरही ॥

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण) · पृष्ठ 2006, कुल 2136 में से · BharatKosha