भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 2005, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2005

१९

जीवधर्मबोध

( १९२७ )

प्रथमहि मातु पिताकी मोहा । अंधभो जिमि काई लग लोहा ॥ जिहि औसर घरनी घर आई । मातु पिताकी प्रीति भुलाई ॥ परम प्रीतमा नारी अहई । बाधिन यथा गरासन चहई ॥ मधुर मधुर बोलै सुसकाई । महा ठगिन जिव ज्ञान ठगाई ॥ हने जबहि सो काम कटारी । सरवस छीन लेय सो नारी ॥ ताते प्रकट भये जो पूता । पूत नहीं आयो यमदूता ॥ मधुर बोल बोलै मन हरही । दिन दिन अधिक प्रीतिपितुकरही ॥ पुत्र कि मोहमें जन्म गँवाये । ताते कबहुं न छूटन पाये ॥ ताकी मोह भयो जिव अंधा । चला अंतको यमपुर बंधा ॥ पुत्रसे कहो कौन सुख पाया । झूल गड़े जड़ मूल नशाया ॥ जन्मतही युवती हरि लीनो । युवा भये तब धन वित छीनो ॥ मूयहुपर कपालको फोरा । मा यह सुत धौ वैरी मोरा ॥ शत्रुको सदा मित्र जग जाना । मूढ़ नहीं चेते विन ज्ञाना ॥ मेरो मेरो कर अज्ञानी । ममतामें भूले सब प्रानी ॥ मोर तोर कहि जन्म गँवावै । भक्ति महातम हाथ न आवै ॥ बन्धु मित्र अरु संगे सखागन । सो समस्त है भक्तिके दुश्मन ॥ इन्है पेलिके हरि यश भनिये । प्रीति कबहुँ मति ठगनते ठनिये ॥

छन्द पद्मिनी

दशदिश देख बहु दृष्टि पसार । कोई नहिं तेरो यहि संसार ॥ मातु पिता स्वारथ हितकार । सुतदारादि सकल परिवार ॥ कोई न तेरो उबारनहार । सब मिलि तोहि नरकमें डार ॥ ताते तजो सकलकी प्रीत । यह दुनिया मतलबको मीत ॥ जिहि औसर स्वारथ ना होय । तेरो संग करे नहिं कोय ॥ बुद्धि विचारि विलोक विलोक । यह जग जान महाठग होय ॥ ठगसे प्रीति किये धन खोय । लहे अमरफलको विष जोय ॥