कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १९३८ )
बोधसागर
३०
तेहि अवसर सतगुरु विहसाना । का मांगे कछु मांग न जाना ॥ तारो सकल सृष्टिको भाई । तुम तो आप रहे अरुगाई ॥ यामें नहिं कछु दोष तुम्हारा । कालपुरुष तुमरी मति मारा ॥ ऐसो समरथ सत्य कबीरा । पलमें सब क्रम कागज चीरा ॥ कोटिन जन्म जो परा भुलेषा । करे जो कृपा चुकावै लेखा ॥ जहँ तहँ देख आप सदगुरु है । नहिं कहँ असुर नहीं कहँ सुर है ॥ असुर भाव जब सुरको आया । ता छन ताको असुर बनाया ॥ सुरते असुर असुर सुर होई । नारिते पुरुष पुरुष तिय सोई ॥ नीचते ऊंच ऊंचते नीचा । उत्तम मध्यम योनिमें खींचा ॥ ताते देखो दृष्टि पसारी । सकलधर्म प्रभु आप बिहारी ॥ मेरे मतसों सब धर्मनमें । खेले खेल सकल कर्मनमें ॥ जो कोइ चीन्है लाल बिहारी । दुबिधा सकल दूरकरि डारी ॥
सत्यकबीर वचन
राम रहीम करीमा केशव हरि हजरतहैं सोई । गहना एकै दृढ है गहना दुतिया और न कोई ॥
चौपाई
सब धर्मनमें आपै खेले । एक दूसरेसे नहिं मेले ॥ भर्मत सारी सृष्टि भुलानी । होय चहुँदिश ऐंचातानी ॥ झूठ सांच जब लेख सविवेका । झूठको तज गहु सत्तको टेका ॥ यह संसार सकल भ्रम छाही । भ्रमकरि सर्व सत्य दरशाही ॥ एक अनेक अनेक भो एका । ज्ञानते होय सो एक अनेका ॥ यथा कांचके मंदिर माहीं । कोटिन मणि मानिक रहजाहीं ॥ झाड़ फतूस अनेकन टांगा । तामें यक भ्रम दीपक जागा ॥ भ्रम दीपक जब तहां प्रकासा । कोटिन दीप मंदिरहि भाषा ॥ यक प्रतिबिम्ब अनेकन देखो । वार न पार लेख कह लेखो ॥
३१
जीवधर्मबोध
( १९३९ )
यक भ्रम दीप जो दियो बुझाई । सकलो भास नाश है जाई ॥ ऐसे एकते भयौ अनेका । बहुरि अनेक एकही एका ॥ यहि विधिसकलजक्त यहलागा । जस भ्रम दीप कांचगृह जागा ॥ ज्ञान उदयते रहै न कोई । यथा नखतगण जलमें जोई ॥ जल सूखे नहीं दरसै तारे । कोई नहीं देखजात किहि द्वारे ॥ ऐसेहि सकल जक्त यह थापा । सबमें शोभित आपै आपा ॥ ब्रह्म सब देसी लख ऐसे । यथास्फटिकमणि देखी तैसे ॥ यही स्फटिक मणिकेर सुभाऊ । जहँजसमतितसगति दरसाऊ ॥ जौन रंग तेहि सन्मुख आना । गहै स्फटिक मणि सोई बाना ॥ कर्मरंग जाट्टंग सघट्टा । देखफटिक मणिमें सोई ठट्टा ॥ राता पीता आदिक रंगा । होयस्फटिकमणि को सोई ढंगा ॥ सर्वांगी अस ब्रह्म बखाना । कर्म बनाव अनेक विधाना ॥ जहँ जसकर्म तहां तस भासू । सो निरलेप है स्वतह प्रकासू ॥ कर्मडोरि जबलों नहीं तोरे । अपनो रूप न पावै भोरे ॥ कर्मबंधते अलग जो होई । परम सोहावन उज्जल सोई ॥ कर्मसूतमें बंधा जो रहई । नाना रंग ढंग गुन गहई ॥ जेते धर्म जक्तके मांही । सबमें सोई ब्रह्म दरसाही ॥ जो दरसै सो सब भ्रम भासा । नहीं दरसै तेहि कौन प्रकाशा ॥ जो नहीं कहन सुननमें आवै । ताको कथा कौन कहि गावै ॥ मन बानीकी गम जहँ नाही । पुनि मनबानी किमि कहताही ॥ नैनते सकल जक्त दरसाई । पै निज रूप न सो लखिपाई ॥ देखे आंख सुने सब काना । रसना रसिक गंध गह ब्राना ॥ त्वचा स्पर्श तेहीको अहई । सबइंद्री निज निज कर्म गहई ॥ आंखिन रशनाको गुन जाना । स्वाद भेद नहीं सो पहिचाना ॥ कान न कबहु रूपको देखे । नाक न कबहु स्पर्शको लेखे ॥
( १९४० )
बोधसागर
३२
इंद्री निज निज कर्मही योगा । निजनिज भोग और नहिं भोगा ॥ सो इन्द्री जेहि ब्रह्म लखाही । कोई इन इन्द्रिनमें नाहीं ॥ जाते आत्मको पहिचाना । ताकी है कछु और ठेकाना ॥ मौन दशा ताते गह साधू । यह सब दीखै भर्म उपाधू ॥ विन जाने जो मौन गहाई । सो नहिं साधु मूर्ख कहलाई ॥ जो कछु कहो कहत नहिं बनई । जो चुप रहौ रहत नहिं बनई ॥ आपै आप खेल सब खेले । भर्म कूपमें मोहि कयों ठेले ॥ रसै बसै सब माह समावै । अर्श पै अपनौ तखत बतावै ॥ जो जाने सो कैसे कहई । नहिं जाने बहु बानी बहई ॥ सबही धर्म जक्तमें तेरो । कहो तो दोष देय सब मेरो ॥
सत्यकबीर वचन
काल दयाल हमै है भाई । छोड़ो दुबिधा काल पराई ॥ सबही धर्म ताहि सतगुरुके । चीन्हे बिनाकाल नहिं सुरके ॥ स्वसंवेदमें कहा बखानी । ताहि बूझि सुख पावै ज्ञानी ॥ काल पुरुष सतपुरुष समायौ । सत्य पुरुषकी देह जो पायौ ॥ सत्यपुरुष दीनों निज देही । कालपुरुष गहि लीनो येही ॥ विषयभोग सब कालकी अंगा । देखहु स्वसंवेद परसंगा ॥ विषयवासना जिहि जिवजागी । सबको धर्मराय है भागी ॥ निविकार अरु विनय विहीना । सकल वासना त्याग जोकीना ॥ सो समस्त सतपुरुष सनेही । सत्यपुरुष पुर पहुँचे येही ॥ इन्द्रीभोग विषय जो ध्यावै । धर्मरायके धाम समावै ॥ सदा रहै सो कालके फंदा । सो नहिं सत्यपुरुषको बंदा ॥ रस प्रीतिसे भक्ति जो करही । विषयविहायनाम निति रहही ॥ कालहिमें दयाल प्रकटाई । गहि करतासु लोक ले जाई ॥ सत्य पुरुषको भक्त कहावै । विषय विकार तेजो मनलावै ॥
३३
जीवधर्मबोध
( १९४१ )
प्रेमभक्ति जामें नहीं कोई । नहीं संतनकी सेवा होई ॥ सो सतपुरुषकि भक्तिसे गिरता । काल पुरुषके बंधन परता ॥
छंद—सत्यपुरुष जो निज बपुवरकह काल पुरुषको दीन्हेऊ । ताही पुरुषमें काल पुरुष कालमें तेहि चीन्हेऊ ॥ अंतरो बाहर दोऊ ठाहरमें निरखि भल लीन्हेऊ ॥ मोरे मते सतपुरुष सबही दूर दुविधा कीन्हेऊ ॥
चौपाई
जाहि धर्ममें जो जिव रहई । जब नखशिखसुकर्म सब गहई ॥ तब सांचा सतगुरु समुहै है । परम धर्मको मार्ग पैहै ॥ जबलों नहीं अति उत्तम करनी । परमपंथ तबलों नहीं धरनी ॥ हो यथा एक गोलाकारा । चहुँदिश ताके घेर सँवारा ॥ मध्यमें बिन्दु घेरके आही । घेरते बिन्दुको लीक जो जाही ॥ सो लकीर सब होहि बराबर । जौँ नहीं इंग बिझ्न मारगधर ॥ तेसे यह मृतलोक बखानो । सब धर्मनको थोक बखानो ॥ गोलाकार जान यह धरनी । ब्रह्मबिन्दु सतगुरुको वरनी ॥ लीक समान धर्म सब जगको । गह सब ब्रह्मबिन्दु मारगको ॥ जौ सुकर्म सब उत्तम होई । पहुँचे ब्रह्मबिन्दुको सोई ॥ टेढ़े टेढ़े चले जो कोई । ब्रह्मबिन्दु पहुँचे नहीं सोई ॥ इमि सब धर्मनके आचारी । टेढ़ चाल जब तज एक बारी ॥ ब्रह्मबिन्दुको तब सो पाई । ठाढ होहि तापर पुनि जाई ॥ सीधे खड़े होहि तेहि ऊपर । तब चहुँओर निहारेहि भूपर ॥ सब धर्मनकी दशा निहारी । केहि कर्मन अरुझे नरनारी ॥ ब्रह्मबिन्दुपर पहुँचे जो कोई । सीधे ठाढ न तापर होई ॥ शुद्ध रूप तेहि दृष्टि न आवै । फेरि फेरि भव भटका खावै ॥ बिन्दुपै सीधे खड़े भे आई । शुद्ध स्वरूप ताहि दरशाई ॥
( १९४२ )
बोधसागर
३४
शुद्ध स्वरूप जीव जब हेरी । करे न सो भवसागर फेरी ॥ गोलाकार स्वरूप बनावो । तामें सकल खेल दृशावो ॥
ब्रह्मविन्दु है आदि पुकारा । करखग आदिकसबधर्म पुकारा॥ निज निजमत जो आछे पाला । तौ सब ब्रह्मविन्दुको चाला ॥ टट्टा टेदे मारग जाहीं । ब्रह्मविन्दु पहुँचे सो नाहीं ॥ सस्सा विन्दुपे पहुँचे जाई । सीधे खड़े भये तहँ आई ॥ पूरन ज्ञानदृष्टि तिन पायौ । परम रूप रमि भवनहि आयौ॥ नन्नाहू लह विन्दु ठेकाना । ठाढ़ होनगति सो नहिं जाना॥ टेदे जायके ठाढ भयञ्ज । ताते शुद्ध स्वरूप न लहेञ्ज ॥ गोलाकार जो कथा बखानी । यह संसार सकल है पानी ॥ पानीमें जिव गोता मारा । बूड़ि जाय पुनि शीश निकारा॥ बूढे उछलै पार न पावै । लख चौरासी माह समावै ॥ जिमि शिशुमारचक यह फिरता । यकपलभरिनहिं ताको थिरता ॥ जो लग्नादिक चक्रमें आही । सबही ताके संग भ्रमाही ॥ भ्रमनकरे निशिदिन सब सोई । तिनको थिरता कबहुँ न होई ॥ ऐसहि गुरु संग सब चेले । भवसागरमें वाजी खेले ॥ उत्तर दक्षिणको जो छोरा । तहँ जो पहुँचहो थिर तेहिठौरा ॥
३५
जीवधर्मबोध
( १९४३ )
जो कोई पहुंचे तेहि खूटा । ध्रुव तारा सम भ्रमनते छूटा ॥ ज्ञानी पहुंचे कुतुबके किले । अटल होहि सो बहुरिन हिले ॥ सतगुरु किला जो ऐसे पैहै । बहुरि न सो भवमें भरमैहै ॥ यह दृष्टांत जो कोई बूझे । निश्चय परम पंथ तेहि सूझे ॥ सकल धर्मको एकै साई । सब पाले निज पुत्रकि नाई ॥ एक सोनार गढै सब गहना । जैसो कर्मरूप तस लहना ॥ सोन रूपको तार बनावै । गढ़िगुढ़ि ठोकि ठांकि सुधरावै ॥ ठोंकि ठांकि जब सीधा करई । यंत्रमें तबहि तारसों धरई ॥ खैंच तार धरि यंत्रके माही । इंग बिंग तब सब मिट जाही ॥ ऐसहि सर्व धर्म जग करो । टेढ बिंग व्यौहार जो हेरो ॥ धर्म कबीर धरहि जेहि बारी । खोट कर्म तब दूर पवारी ॥ तार समान सकल मत मंत्री । धर्मकबीर सोनारको यंत्री ॥ दोय प्रकार वासना अहई । भली बुरी जाको सब कहई ॥ दोनों भवसागरमें डारा । कहा करे यह जीव बेचारा ॥ अर्थ अरु धर्मकाम अरु मोखा । चारों त्यागे साधु सो चोखा ॥ चारते पार और जो होई । सतगुरु भेद बतावै सोई ॥
सत्यकबीर वचन
सारखी-तीरथ गयेते एक फल, संत मिले फल चार । सतगुरु मिले अनेकफल, कहै कबीर विचार ॥
चौपाई
कर्मको फल नर पावै कैसे । भोजन रस तन व्यापै जैसे ॥ जैसे भोजन जो को खाई । ताहीको गुन तामें आई ॥ आकशमात कर्म फल पावत । दुःखसुखसबजिवकोप्रकटावत ॥ जस बासना कर्म कर तैसा । तेहि अनुसार धर्म गह ऐसा ॥ सब निज निज वासना गहाई । ता तोषनकी करे उपाई ॥
( १९४४ )
बोधसागर
३६
नवी मलेशस्थानको यक रह । प्रभुप्रति विनतीकरि ऐसे कह ॥ हे प्रभु मोहि तियरति बलथोरा । यह बरदेव होय सो जोरा ॥ तेहि नम वानी कीन पुकारा । रति कारन कर मांसु अहारा ॥ मांसु खान लागा तब सोई । जान्यो प्रभुकी आज्ञा होई ॥ जस मनोरथ तैसी प्रभु आज्ञा । सत्य कहो करिके परितिज्ञा ॥ जस वासना जीव उर खोले । ताको यतन अकाशते बोले ॥ तथा फिरिशते स्वपना सुथरे । तस कलाम अछाको उतरे ॥ मिश्रसे जबहि यहूदी चाले । जब उजाड़में आय निराले ॥ मांसु खान कह प्रभु प्रतिटेरी । दियौ लगाय बटेरकी ढेरी ॥ खातहि खात मृत्यु तेहि डाला । कर्मको फल पायौ ततकाला ॥ जिन जिन मांसु खानको रोये । बचन एक प्रान सब खोये ॥ बीस वर्षके ऊपर जोई । सब मरि गयौ बचा नहिं कोई ॥ ज्ञान बिनाको प्रभु पहिचाना । ताको धर्म न कोई जाना ॥ जैसो धर्म धरे जो कोई । तैसी गति निश्चय लह सोई ॥ कोई स्वर्ग नर्कको भोगा । कोई अधर मृत्यु पुर लोगा ॥ जीव वासना प्रेरि लेआवै । ताही गतिमति स्थित करावै ॥ तीनों पुर पसरा यमजाला । कोइ बचै जेहि राख दयाला ॥
सत्यकबीर बचन
तीनों लोकमें लागी आग । कहैं कबीर कहैं जैहो भाग ॥
चौपाई
उभयवासनां ते जिव अटका । छूटै न आवा गौन को खटका ॥ कालहि रचै कालही पोषे । कालहि सब रचनाको सोषे ॥ कालको कृत कालही खैहै । कोई विरला गुरुगमबचजैहै ॥
कुंडलिया
निर्वाकार आतम सदा, वंधाकर्मकी डोर । मरकट नटके हाथ जिमि, फिरताखोरिन खोर ॥
३७
जीवधर्मयोग
( १९४५ )
फिरता खोरिन खोरि, कंठमें कर्म जझीरा । दर दर नाचत जाय, पाय तन मन बहु पीरा ॥ पीरा लह मतिमंद, होय नहीं बन्द खलासी । बंद दयाल जेहि काल, कालकी काटे फांसी ॥ कबीर खड़े बाजारमें, गल कट्टोंके पास । जो कोई करे सो भरेंगे, तुम क्यों भये उदास ॥ तुम क्यों भये उदास, भाष कर्महिको सारा । कर्मको रचित जहान, खान चहुँ कर्म सँवारा ॥ कर्म सँवारा दर्ब, सर्व जहाँलों जग दरसै । आतम तो निरलेप, एक सम सबमें सरसै ॥ हृदमें चल सो मानुवा, वेहह चले न कोय । हृद वेहहके बीचमें, रहौ कबीरा सोय ॥ रहौ कबीर सोय, कोय नहीं ताको परसै । परसै संत सुजान, ज्ञानके नैनन निरसै ॥ निरसै ज्ञानके नैन, परख पूरन सो पावै । जहाँ तहाँ दशै आप, ताप तिहुँ दूर बहावै ॥ हृदमें चलै सो मानुवा, बेहह चलै सो साध । हृद बेहह जो दोनों त्यागे, ताको मता अगाध ॥ ताको मता अगाध, आध अरु व्याध न लागे । कर्म जनित सब रोग, भोग भवमें नहीं पागे ॥ नहीं पागे भवभोग योग, जग नाता तोरे । टूटे न भजनको तार, प्रीति नामहिते जोरे ॥ हिंदू कही तो हौ नहीं, मुसलमान भी नाहिं । पांच तत्त्वको पूतला, खेलै गैबी माहिं ॥ खेलै गैबी माह गैबको गैबी जाने ।
( १९४६ )
बोधसागर
३८
कहन सुनन कछु नाहिं, विचार हृदय निजआने ॥ आने हृदय विचार, चारु चिर चोर चपेरे । मूसे जो घर मोर भोर, निश ताको हेरे ॥
चौपाई
काल कराल आपही जानी । ब्रह्मा विष्णु महेश भवानी ॥ षट्दरशन सोई प्रभु थापा । सब पंथनमें आपै आपा ॥ मूसा ईशा महम्मद आदिक । सोई सब मतके मरजादिक ॥ सब धर्मनको सोइ अचारज । सबहीको कीने प्रभु कारज ॥ सब ही धर्म ताहिको जानी । प्रणवों सबहि मनोक्रम बानी ॥ सोई प्रभु सबही ये देखा । बपुरा जीव करे कह लेखा ॥
छन्द—आप खास है आप दार है आप खेल खेलायऊ । मलसोध जीव प्रबोध कीनो बौध होकर आयऊ ॥ जग जगन्नाथको माथ नावैं रूप और बनायऊ । थापे महात्म बौधको खुद बौधीदास कहायऊ ॥
चौपाई
दोय पुत्र ब्रह्माके भयऊ । यकसुरदुतियअसुर जो कहेउ ॥ सत्तोगुनी सुर कह सब कोई । विषय विकारी असुर सो होई ॥ तीन लोकमें विषय विकारा । चौथा लोक विषयते न्यारा ॥
सत्यकबीर वचन—चौपाई
विषय विकार मान मद जेते । सो सब प्रभु असुरनको देते ॥ जाने थोर बहुत जो कहई । तीनों काल मूर्ख सो रहई ॥ जेते जाने तेते जो भनिये । मध्यम गतिमें ताको गनिये ॥ जाने बहुत कहे जो थोरा । सोई ज्ञानी सब शिरमौरा ॥ सब धर्मनको भेद जो पावै । ताकी बुद्धि शुद्ध है जावै ॥ जाके धर्म ताहिंते जांचो । तब लखिपरे झूठ कह सांचो ॥
३९
जीवधर्मबोध
( १९४७ )
जौन धर्मगति चह चित सुनिया। ढोढों ताको पंडित गुनिया ॥ पक्षरहित जो बात बतावै। तामें कछू कसर जौ आवै ॥ तौ पूछो औरन बुध लोई। निजबल बुद्ध बतावे सोई ॥ एक कि भूल दूसरा कहई। यहिविधिचतुरशंकनिजदहई ॥ औरको धर्म औरते बूझै। ताको दिनदोपहर नहि सूझै ॥ वायस मिल वायसहि प्रशंसा। हम सम नहि ब्रह्माको वंशा ॥ हमसम और न बोल सुधारा। जाने कह कोकिला गँवारा ॥ सो सुनि भूलि जाहि जिवसंठा। जानन कागहि जो कटुकंठा ॥ जिमि उलूक निजपरको ठानू। कानते सुने न देखे भानू ॥ तामें सब कोइ मिथ्या करई। जगमें कतहु न सूरज अहई ॥ ताकी शास्त्र भरनको साचा। चमगुदरी उठि बोली वाचा ॥ सुनि लीजै उलूक मम आता। जो कछु कहो सत्य तुम बाता ॥ मैं कबहुँ दिनकर नहि देखा। कहै जक्त सब झूठा लेखा ॥ भरे बहुरिके ताकी साखी। आय छछन्दर ऐसे भाषी ॥ सत्य वचन तुम दोहुकी आही। दिनकर तीनकाल कहुनाही ॥ ऐसहि अंधहि अन्ध सराहत। जो दिनपतिहि दूरकरचाहत ॥ तिनके वचनमें जो जिव बंधे। तिनसमान सो सबही अन्धे ॥ जाधर पकै हरामको दाना। तिनको धर्म कर्म बिन माना ॥ जो कोई करे हराम कमाई। आप खाय अरु और खिलाई ॥ जो हरामको दाना देहे। ताको दंड आप शिर लैहे ॥ खाय हराम हरामही करि है। करि हराम भवसागर परि है ॥ जो कोई अन्न हरामको खाई। ताकी बुद्धि अन्ध हो जाई ॥ बुद्धि विभंग होय जब जाको। धर्मकथा भावै नहि ताको ॥ अन्धकार जब हृदयें घरे। शुद्धपन्थ सो कबहु न हेरे ॥ खाय हराम हरामी जायौ। मातु पिताकुलकानि गवायौ ॥
( १९४८ )
बोधसागर
४०
करि श्रम शुद्ध अन्नभक्ष जोई । ताकी कृपा शुद्ध सब होई ॥ भक्ष सुअन निजधर्म जो पाला । ज्ञान दृष्टि पावै ततकाला ॥ विषकी बेल है यह संसारा । चहुँदिश आवै विषकी झारा ॥ जलथलमें विष रहा समार्ई । विष नहिं तजै भजै चितलाई ॥ विषहीमें निज भौन बनाई । विषय भोगि विषको तनपाई ॥ सबही सन्त श्रुति कहे बखानी । नरस्वरूप नारायण जानी ॥ लिखो वेद वेदान्त पुराना । तौरे तो इअील कुराना ॥ सब ही मिल करते निरधारा । नर ईश्वर निज रूप संवारा ॥ निश्चय नर नारायण देही । पै जब ईश्वर गुनगह येही ॥ जबलों ईश्वर गुन नहिं गहई । संज्ञा जीव तासुको रहई ॥ ताते जीव शीव शिव कहिये । विषयबिकारनतनमन गहिये ॥ जब सबही शुभगुनगहि लीना । ब्रह्मस्वरूप ताहि कहि दीना ॥ ब्रह्मस्वरूप आप जब मंडा । तब रचि सके कोटि ब्रह्मण्डा ॥ सिरजै पोष प्रलय करिडारी । पुण्यपाप नहिं ताहि विचारी ॥ जिमि शिशुमाटीधूल खेलोना । नाना भांति रचै मनभौना ॥ खेलि खेलि पुनि मिट्टी मेल। ऐसहि ब्रह्म सृष्टि को खेला ॥ सकल सृष्टिको करता होई । ताको नाम जपै सब कोई ॥ जो जिव विषयनमें लपटावै । दिन दिन तुच्छ देह सो पावै ॥ जब जब तुच्छ अन्त है जाई । नरकनमें निज भोन बनाई ॥ ताते विषई जीव सबनकी । विषयविहिन देह ईश्वरकी ॥
सत्यकबीर वचन
सारखी-कबीर कबीर तु क्या करो, साधो अपना शरीर ।
पांचो इन्द्री वश करो, तुमही दास कबीर ॥
बुलेशाह वचन
काम क्रोध लोभ मोह हंकार । पञ्चो कटुवां जू दो मार ॥ इन्हा करवी है बदवो । बुछा आपै अल्लह हो ॥
४१
जीवधर्मबोध
(१९४९)
यह संसार दुसह दुःख दागा । बिरत विचारी सन्तसो त्यागा॥ कौन राम कौनी विधिजपना । कौन ठौर तेहि प्रभुको थपना॥
सत्यकबीर-बचन
सारखी-रामजपत है नामको, नाम जपता है थीर । ताहुते कछु अपर है, ताको जपै कबीर ॥
चौपाई
उत्तम धर्म जो कोइ लखि पैंये । आप गहो अरु और गहैंये ॥ ताते सत्यपुरुष हिय हवैं । कृपा वारि तब तोपर वषैं ॥ सत्यकबीर केर परमाना । यहि विधि तैंसो करे बखाना॥ जो कोउ जीवहि राह बतावैं । परमपुरुषकी भक्तिमें लावैं ॥ ऐसो पुण्य तासुको बरना । एक मनुष्य प्रभु सन्मुख करना॥ कोटि गाय जिमि गहे कसाई । ताके करते लेत छोड़ाई ॥ परम पुरुषते जब जिव जूटै । काल कसाई करते छूटै ॥ भक्ति कठिन अतिशय कठिनाई । बिना भक्ति कोइ पार न पाई॥ भक्ति भवन अति उत्तम ऊंचा । इनसीठी बिरला कोइ पहुँचा॥ लागे तहां त्रिविधि सोपाना । एकते एक विचित्र बखाना ॥ रजगुन तमगुन सतगुन वरतो । द्वै तजिके तृतिये पग धरतो ॥ जब सतगुन सीठीपर चढ़िये । तब तहैं ज्ञान अगोचर पढ़िये॥ पढ़िके ज्ञान भयौ जब पक्का । तब सो भक्ति भवनको तक्का ॥ भक्तिभौत जब चाहत चलिये । तब सतगुरु प्रतिहारते मिलिये ॥ ताहि पौरि यहि भेट चढ़ावो । भक्तिभौन तब पैठन पावो ॥ तन मन धन सब अर्पन कीजै । शिर उतारि तेहि चरणधरीजै॥ जो दयाल हो सो प्रतिहारा । भक्तिभौन तब हो पैठारा ॥ भक्तिभौनको भेद जो पाया । त्रिगुन पौरि सो बहुरिन आया॥ आदि अन्त सतगुरु गुनगावो । जिन तोहि भक्तिभौन बैठावो॥
( १९५० )
बोधसागर
४२
भक्तिहि भक्ति भेद बहुतेरा । गहसो भक्ति भेट भवफेरा ॥ विमल भक्ति गहिये मन लाई । जाते त्रिगुनातीत कहाई ॥ आप आप जिव आप फँसाई । आपै बँधा आप दुख पाई ॥ जस क्रमयक जेहि कह खुसियारी । ताकी ऐसी कथा उचारी ॥ सो ऐसो निज भौन बनावै । आपको तामें आप फँसावै ॥ आप चरित ग्रह बंधै आपू । काहूको कछु दोष न पापू ॥ ताहीमें सो फँसि मरिजाई । विविध भांतिसे सो दुखपाई ॥ बंधा तौ पै खुलै न कोई । जब लगि सतगुरु कृपा न होई ॥ हाथ पांव पटकै औ रोवै । तब गुरुकृपा केर भ्रम खोवै ॥ जाति पांति कुल कानि गवावै । भली बुरी कछु चित्त नहिं ल्यावै ॥ सकल नेहको नाता तोरे । प्रीति सदा सतगुरुसे जोरे ॥ वेद कितोब शरा अरु सुन्नत । सो नहिं कछु निज मनमें उन्नत ॥ यह सबही दुनियांकी फांसी । ताते नहिं भेटे अविनाशी ॥
कवित्त-शरीअतकी सलाई जिव आँखन चलाई भय अंध यमबन्ध धोरवधन्धमें परत है । कोई कह हम हिंदू ही जो ऊंचे कुलबिंदू कोई कह हौ ईसाई ईशा आसराध रत है ॥ कोइ वह मुसलमान हौही साबित ईमान मारो काफिरन सारा जंग जेहाद करत है । नहिं चीन्है कोइ देव करे भरम कि सेव गुरु सैन बिन येव लड़ि लड़िके मरत है ॥
सत्यकबीर वचन
मुसलमानकी काटी चमड़ी हिंदूकी बेधे कान । कहे कबीर इस बोलतेको पहिचान हिंदूकी है मुसलमान ॥
चौपाई
जीवधर्म पुरुषार्थ गोगू । ताते सुख पावै सब लोगू ॥
४३
जीवधर्मबोध
( १९५१ )
कछुक कहो पुरुष पुरुषारथ । जो हित स्वारथ अरु परमारथ॥ शिव दधीच हरिचंद समाजा । बलि विक्रम करणादिक राजा ॥ सूरशाह सिकन्दर हातम । हनुमत भीष्म द्रोण भाषेतिम ॥ ब्रह्मा हरि शिव मनु सतरूपा । गोरखदत्त कि कथा अनूपा ॥ कौशिक व्यास वशिष्ठो नारद । शृंगी शुक् विज्ञान विशारद ॥ केते ऋषि मुनि करनी करहीं । कीरति जासु जक्त उच्चरहीं ॥ जीअत ही साधू जो मरेऊ । सूरसती शुभ करनी करेऊ ॥ साकजके हरि कानन कहई । स्वान शृंगाल पेट तेहि भरई ॥ सूर सन्त इमि करनी करही । जक्त जीव ले पार उतरही ॥ तप बल शेष धरे महि भारा । तपबल ब्रह्मा सिरजन हारा ॥ तप बल विष्णु जक्तको पोषै । तप बल शंभु ताहि पुनि सोषै ॥ तप आधार जक्त जगदीशा । तप बल जीव बने हैं ईशा ॥ जैसे जगमें सूर सयाना । निजभुजबल अरिदलदलनाना ॥ करि श्रम सुखी भये सब सोई । तन धन मोह स्यार सब रोई ॥ जहँ लगि जब विद्या चतुराई । पुरुषारथसे सब कछु पाई ॥ आलसी जीवको विद्या नाहीं । धन नहि होय अविद्या पाहीं ॥ निरधनको कोइ मित्र न होई । बिना मित्र निरबल नर सोई ॥ निरबलको सबही दुख घरे । दुखिया दीन तुच्छ जग हेरे ॥ पुरुषनको पुरुषारथ चाही । नारि पतिव्रत धर्म निबाही ॥ मृदु सजापर सोवनहारे । भय सो कीट पतंग बेचारे ॥ विविध प्रकार विषय जिन भोगा । अंतकाल सहसो सब शोगा ॥ मचे जबै घमसान लड़ाई । कोई धीर वीर ठहराई ॥ कैसहु महा महिष किन होई । जो रन तजिके भागे सोई ॥ कतल कैद हो राज विभंगा । कायर नहि देखे रनरंगा ॥ ऋषि मुनि शूर वीरकी करनी । कहलो कहो जाय नहि वरनी ॥
( १९५२ )
बोधसागर
४४
जहाँ लगि तन पोषक नर नारी । सो नहिं करनीके अधिकारी ॥ सिन्धुमें जो कोई गोता मारा । सो नहिं राखै भय घरियारा ॥ जबलोंं सिंधु न डुबकी मारे । तबलोंं रत्न हाथ नहिं धारे ॥ शर शय्यापर भीष्म विराजे । करि षट्मास शयनगति साजे ॥ तन मन कसहि मुनीश्वर ज्ञानी । लहै भक्ति सब सुखकी खानी ॥
सत्यकबीर वचन-रेखता
हमनसे मतमिलो यारो हमन खफकी दिवाने हैं । खुशीकी राह छोड़ी हैं कठिनमें जा सामने हैं । हमन दिन रैन रोते हैं वो रामसे जान खोते हैं । सुली की सेज सोते हैं विरहके ये रकाने हैं ॥ हम न हथियार हैं जानी पिया हरिनामको पानी । आखिर सब होवैगे फानी बलीमें जा समाने हैं ॥ तजी खिदमत वजीरीकी लही लज्जत फकीरीकी । चढ़े किस्ती सबूरीकी फुकुरके रकाने हैं ।
चौपाई
पुरुषारथकी ऐसी बातें । कर अवश्य पुरुषारथ ताते ॥ यथा कृषान कृषानी करई । उपजैं अन्न पेट निज भरई ॥ हलवाही अवश्य तेहि करना । भली भांति निजखेत सँवरना ॥ बीज बोय रखवाली कीजै । पशु पंछी करिसो मति कीजै ॥ करि निज श्रम बिनवै प्रभुपाही । भरे खेत वर्षाकरि ताही ॥ जो ईश्वर वर्षा नहिं करई । वृथा कृषानी ताकी परई ॥ जो बरपैं बरवारी सुकाला । तो कृषान सो होय निहाला ॥ जो आलस करिके नर कोई । संशय पै हल जोतै नहिं सोई ॥ बीज न बोय न कर रखवारी । बपैं घन अरु भरे कियारी ॥ ताहि अन्न फल हाथ न आये । मूरख मिथ्या आस लगाये ॥
४५
जीवधर्मबोध
( १९५३ )
बिन बोये कहु किनकिन लुनिया । सो जड़ जो यह ज्ञान न गुनिया ॥ ताते पुरुषारथको कीजै । दोऊ लोकमें सुयश लहीजै ॥ सर्वशास्त्र सदग्रंथ विलोका । जान्यौ सर्व धर्मको थोका ॥ तजि असार सार जो आही । सो पंडित मराल मति आही ॥ उत्तम धर्म धरे जो कोई । उत्तम करनी करिहैं सोई ॥ नीच धर्म जो कोई गहई । उत्तम करनी सो किमि लहई ॥ साधु पुत्र नहिं करे कुकर्मा । पुत्र असाधु कुकर्महि धर्मा ॥ कर्मयोनिजनिज मातुपिताका । जिव तेहि भली दृष्टिकरि ताका ॥ ऐसहि सब धर्मनके लोगा । करहि कर्म निज गुरु संयोगा ॥ शुद्ध अशुद्ध विचार न हारा । सो हंसा बिरला संसारा ॥ कहूं कहूं विपरीति देखावै । साधु सुअन असाधु कहावै ॥ कहूं भक्तभा सदन कसाई । पै यह कथा अनोख बताई ॥ धर्म तुच्छ गहि बड़ पद पावै । ऐसेहु कहूं कहूं देखलावै ॥ है परंतु यह अति अज युतरी । रसिकस्वाद कहैं दे कठपुतरी ॥ कोई चंडाल करे द्विज करनी । सो सतसङ्ग केर फल बरनी ॥ उत्तम कुलमें जो जिव होई । मध्यम करनी जाय बिगोई ॥ त्यागहि पक्ष साधु जो ज्ञानी । हो अपक्ष यह मुक्ति निशानी ॥ निजनिज गुरुपद गह सब आछे । यथा भेड़गण पालि न पाछे ॥ निज निज धर्म सत्य सब कहई । ताते परमपन्थ नहिं लहई ॥ जब काहू सच शंका आवै । निज पद पौर गुरु बैठावै ॥ रामचन्द्र मन संशय आई । देह विदेह मुक्ति अर्थाई ॥ मुनि वशिष्ठ निज ज्ञान सुनाये । अपनी ठौर फेर बैठाये ॥
( १९५४ )
बोधसागर
४६
योगवाशिष्ठ द्वितिय मुमुक्षुप्रकरण चतुर्थसर्गः
वशिष्ठ वचन
दोहा—जीवन मुक्ति विदेहको, तू नहीं जाने हेत । सहित असम्यकज्ञानके, जान न रघुकुलकेत ॥ स्वसंवेदमें भेद जो, भाषत ज्ञान बिहीन । ज्ञानवन्तको भेव नहीं, सम्यकहृदय जेहि पीन ॥
चौपाई
सदाकाल ऐसहि चलि आई । निज निजमता मुनीश मिलाई ॥ कोई कह भिन्न जो मारग लेई । गुरु निज पक्षन विचलन देई ॥ उत्तम करनी जौँ नहीं करिये । तो नहीं उत्तम गुरुपद धरिये ॥ शम दमादि करि इन्द्री जीते । आवागौन दुसह दुःख बीते ॥ चारि खानि जिव जो तन धारी । मालुष प्रभु निज रूप सँवारी ॥ भक्ति हेत यह उत्तम देही । प्रभुहि बिसार जो धरि तनयेही ॥ सोई अधर्म आत्महत्यारा । नर तन पाय न काज सुधारा ॥
इति
अथ मनुष्यको नित्यकर्म वर्णन
चौपाई
भोरहि उठि नित कर्म करीजै । करि तन शुद्ध भजन चित दीजै ॥ प्रभु प्रति बिनय बचनते मांगे । महा दीन हूँ ताके आगे ॥ मोर मनोरथ कर प्रभु पूरा । दीनबन्धु कीजै दुख दूरा ॥ सर्व समय तुहि जग करता । तेरो हुकुम सर्वपर बर्ता ॥ मोर उधार करो प्रभु सोई । विघ्न बिहाय कृपा तौ होई ॥ गुरु अचारजको निज टेरे । सदा सहायक अपनो हरे ॥ बार बार कर प्रभु प्रति बिनती । यद्यपि सो न करे कछु गिनती ॥ कबहुके दाय़ा प्रभुकी होई । दुःखदरिद्र सब डारे खोई ॥ लामालाभ एक सम गनिये । सदाकाल प्रभु गुनगन भनिये ॥
४७
जीवधर्मबोध
( १९५५ )
जपतप वेद पाठ शुभ कर्मा । गुरु जासु वश भाषे मर्मा ॥ गृही होयके साधू होई । निजु निजु धर्म धरे सब कोई ॥
इति
अथ नरशरीर गुरु अधीन वर्णन—चौपाई
प्रथमै जिव जब गर्भमें आवै । तीन तापते सो अकुलावै ॥ जठरानलकी तीक्ष्ण तापा । महादुःख तहैं जीवहि व्यापा ॥ जठर अग्निसे अस दुख पावा । जैसे तस लाल हो तावा ॥ तेहि तावापर जिव जो धरई । तलफि तलफि गरमीते भरई ॥ ऐसे जठर अग्नि तेहि दागे । तहैं जिव बिनय करे प्रभु आगे ॥ अबकि बार प्रभु मोहि वचावो । बाहरनकिस भजन मन लावो ॥ दुतिये मल अरु सूत्र मलीना । तामैं दूवा दुखिया दीना । भोगे दुःख महा दुरगंधा । तृतीये उलटा टांगा बंधा ॥ यहि विधि जीव नर्क तहैं भोगा । तीन ताप व्यापे सौ शोगा ॥ बार बार तहैं करे करारा । त्राहि नाथ कर मोर उबारा ॥ भजन छोड़ि न करो कछु आना । प्रभुकी भावभक्तिमें ध्याना ॥ तहैं जिवके सन्मुख प्रभु ठाढ़ा । दया करे सो दुख लखिगाढ़ा ॥ सो करार सुनि हरि हर्षाना । बन्धन काठके बाहर आना ॥ जबहि गर्भसे बाहर काढ़ा । भूला कौन मोहमद बाढा ॥ गर्भमें पोषे पालै आपै । प्रभुकी दया दुःख नहीं व्यापै ॥ पालि पोषि पुनि बाहर धरई । मातु पिताको आश्रित करई ॥ मातु पितहि सौपे शिशुसेवा । गुप्त हो तबहि परम गुरुदेवा ॥ मातु पिता तबलो तेहि पाला । जबलों नहीं बीते पन बाला ॥ बालापन जबही बितजाई । विद्या पाठ गुरु ढिग जाई ॥ मातुपिता गुरु आदि अवस्था । ताबिन जीव न पावै रस्ता ॥ पुनि गुरु कुटुम्ब जातिगण जोई । कुल मरजाद सिखावै सोई ॥
(१९५६)
बोधसागर
४८
विद्या पाठक पहुँ जब जावै । विद्या सकल ताहिते पावै ॥ विद्यापढ़ि जब भयौ परवीना । धर्म अधर्म मर्म सब चीन्हा ॥ वेद शास्त्रको सबही छाना । तऊ न भक्तिभेद कछु जाना ॥ तब जिव संतकी संगति गहई । ताते ज्ञान लाभ सो लहई ॥ ज्ञानपाथ जब सतगुरु चीन्हा । ताके चरणमें चित दीन्हा ॥ आठ गुरुके नाम बखानो । जिनते जग जिव लाभ लहानो ॥ पहिले गुरु मातु पितु जानी । रज वीरजते देह उपानी ॥ दूजा गुरु है मनको दाई । गर्भमाह जिन युक्ति बनाई ॥ तीजा गुरु नाम जिन धारा । ताहि नाम ले लोग पुकारा ॥ चौथा गुरु जिन विद्या दीना । कुल मर्याद रीति सब चीन्हा ॥ पंचम गुरु जिन दीक्षा दीनो । रामकृष्णको सुमिरन कीनो ॥ छठये गुरु जिनभ्रम गढ़ तोड़ा । सबसे तोड़ एकसे जोड़ा ॥ सतवाँ गुरु जिन सत्य लखाया । जहाँको था तहँवा बैठाया ॥ एते गुरु हैं जक्त मझारा । जीवहि राह बतावनहारा ॥ अठये गुरु पारख पद बंदा । जाते कटे सकल यमफंदा ॥ भक्तिहि भक्ति भेद अधिकाई । तासु कथा कछु देहु सुनाई ॥ अक्षर तीन भक्तिमें धारी । ताको ऐसो अर्थ उचारी ॥ प्रथम भकारसो भव बतलावो । आवागमन जो दूर करावो ॥ दुतिये ककार करे कल्याना । तृतिये तो जिवको दे ज्ञाना ॥ भक्ती दोय प्रकार बखानो । विहित अविहित जाको जानो ॥ ऐसे प्रथम विहित निरतावो । वेद शास्त्र विधि भक्ति कमावो ॥ ताहि विहितमें चार प्रकारा । प्रथम कामना सहित उचारा ॥ जिमिहरिपदध्यायौवृजवनिता । निजमनोरथयुतभक्तिसोभनिता ॥ दुतिये बैरभाव करि ध्यावन । जिमि हरिनाकुस आदिकरावन ॥ तृतिये भयकरि भक्ति गहाई । जस मारीच भक्त रघुराई ॥
४९
जीवधर्मबोध
( १९५७ )
चौथ प्रथम भाव मर्यादिक । जैसे नारद अरु सनकादिक ॥ तिनमें द्वैको त्याग बखाना । भय अरु वैर न भक्ति प्रमाना ॥ पुनि दुतिये अविहित कहावै । प्रेम उमंग हृदयमें आवै ॥ आपसे आप प्रेम उमडाना । वेदशास्त्र विधि कहु नहिं जाना ॥ उठै उमंग प्रेमकी धारा । आपै भक्ति गहै हरि प्यारा ॥ सबसे श्रेष्ठ भक्ति है येही । मिले धाय निज परम सनेही ॥ याहूमें कहिये द्वै ढंगा । प्रथम प्रमान कीन ज्ञान अंगा ॥ ताके अंगा भक्ती कह सोई । ज्ञान उपाय मुक्तिकर जोई ॥ दुतिये सो मंत्र भाषिये ताही । याके आप ज्ञानमय आही ॥ भक्तिको भाग ज्ञान कहलावे । भक्तिमें सकल ज्ञानगुन पावै ॥ विहित अविहित कीन उचारा । बहुरि भक्ति कह तीन प्रकारा ॥ उत्तम मध्यम प्राकृत ताना । तिनको ऐसे अर्थ बखाना ॥ उत्तम भक्तीको यह लेखा । सर्व मई ईश्वरको देखा ॥ जल तरंग जस भेद न कोई । भक्ती श्रेष्ठ कहावै सोई ॥ शत्रु मित्र जगमें नहिं कोई । आपै आप रमै प्रभु सोई ॥ दुतिये मध्यम भक्ति बन्दता । भगवत भक्त और भगवन्ता ॥ दोनों ते सो प्रीति लगावै । दुरजन देखि न ताको भावै ॥ तृतिये प्रतिमा पूजा ठाना । मूरत को भगवत करिजाना ॥ भगवत भक्तनसे नहिं प्रीति । प्राकृत भक्त केर यह रीति ॥ बहुरि भक्ति कह तीन बिधाना । सात्त्विकराजसतामस जाना ॥ सात्त्विक भक्ति कहे निष्कामा । राजस होय कामना जामा ॥ तामस बैरी विजयके कारन । त्रिविधभक्ति पुनि कीन उचारन ॥ मानस बाचक कायक होई । बहुरि चार बिधि कहिये सोई ॥ प्रथम जोद्रोपदि आरतनिजहित । दुतिये जिह्वासू नृप प्रीछित ॥ तृतिये अर्था अर्था सोई । दुनिया चाहे ध्रुव जस होई ॥