भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( १९४१ )

प्रेमभक्ति जामें नहीं कोई । नहीं संतनकी सेवा होई ॥ सो सतपुरुषकि भक्तिसे गिरता । काल पुरुषके बंधन परता ॥

छंद—सत्यपुरुष जो निज बपुवरकह काल पुरुषको दीन्हेऊ । ताही पुरुषमें काल पुरुष कालमें तेहि चीन्हेऊ ॥ अंतरो बाहर दोऊ ठाहरमें निरखि भल लीन्हेऊ ॥ मोरे मते सतपुरुष सबही दूर दुविधा कीन्हेऊ ॥

चौपाई

जाहि धर्ममें जो जिव रहई । जब नखशिखसुकर्म सब गहई ॥ तब सांचा सतगुरु समुहै है । परम धर्मको मार्ग पैहै ॥ जबलों नहीं अति उत्तम करनी । परमपंथ तबलों नहीं धरनी ॥ हो यथा एक गोलाकारा । चहुँदिश ताके घेर सँवारा ॥ मध्यमें बिन्दु घेरके आही । घेरते बिन्दुको लीक जो जाही ॥ सो लकीर सब होहि बराबर । जौँ नहीं इंग बिझ्न मारगधर ॥ तेसे यह मृतलोक बखानो । सब धर्मनको थोक बखानो ॥ गोलाकार जान यह धरनी । ब्रह्मबिन्दु सतगुरुको वरनी ॥ लीक समान धर्म सब जगको । गह सब ब्रह्मबिन्दु मारगको ॥ जौ सुकर्म सब उत्तम होई । पहुँचे ब्रह्मबिन्दुको सोई ॥ टेढ़े टेढ़े चले जो कोई । ब्रह्मबिन्दु पहुँचे नहीं सोई ॥ इमि सब धर्मनके आचारी । टेढ़ चाल जब तज एक बारी ॥ ब्रह्मबिन्दुको तब सो पाई । ठाढ होहि तापर पुनि जाई ॥ सीधे खड़े होहि तेहि ऊपर । तब चहुँओर निहारेहि भूपर ॥ सब धर्मनकी दशा निहारी । केहि कर्मन अरुझे नरनारी ॥ ब्रह्मबिन्दुपर पहुँचे जो कोई । सीधे ठाढ न तापर होई ॥ शुद्ध रूप तेहि दृष्टि न आवै । फेरि फेरि भव भटका खावै ॥ बिन्दुपै सीधे खड़े भे आई । शुद्ध स्वरूप ताहि दरशाई ॥