भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९४२ )

बोधसागर

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शुद्ध स्वरूप जीव जब हेरी । करे न सो भवसागर फेरी ॥ गोलाकार स्वरूप बनावो । तामें सकल खेल दृशावो ॥

ब्रह्मविन्दु है आदि पुकारा । करखग आदिकसबधर्म पुकारा॥ निज निजमत जो आछे पाला । तौ सब ब्रह्मविन्दुको चाला ॥ टट्टा टेदे मारग जाहीं । ब्रह्मविन्दु पहुँचे सो नाहीं ॥ सस्सा विन्दुपे पहुँचे जाई । सीधे खड़े भये तहँ आई ॥ पूरन ज्ञानदृष्टि तिन पायौ । परम रूप रमि भवनहि आयौ॥ नन्नाहू लह विन्दु ठेकाना । ठाढ़ होनगति सो नहिं जाना॥ टेदे जायके ठाढ भयञ्ज । ताते शुद्ध स्वरूप न लहेञ्ज ॥ गोलाकार जो कथा बखानी । यह संसार सकल है पानी ॥ पानीमें जिव गोता मारा । बूड़ि जाय पुनि शीश निकारा॥ बूढे उछलै पार न पावै । लख चौरासी माह समावै ॥ जिमि शिशुमारचक यह फिरता । यकपलभरिनहिं ताको थिरता ॥ जो लग्नादिक चक्रमें आही । सबही ताके संग भ्रमाही ॥ भ्रमनकरे निशिदिन सब सोई । तिनको थिरता कबहुँ न होई ॥ ऐसहि गुरु संग सब चेले । भवसागरमें वाजी खेले ॥ उत्तर दक्षिणको जो छोरा । तहँ जो पहुँचहो थिर तेहिठौरा ॥