भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मबोध

( १९५५ )

जपतप वेद पाठ शुभ कर्मा । गुरु जासु वश भाषे मर्मा ॥ गृही होयके साधू होई । निजु निजु धर्म धरे सब कोई ॥

इति

अथ नरशरीर गुरु अधीन वर्णन—चौपाई

प्रथमै जिव जब गर्भमें आवै । तीन तापते सो अकुलावै ॥ जठरानलकी तीक्ष्ण तापा । महादुःख तहैं जीवहि व्यापा ॥ जठर अग्निसे अस दुख पावा । जैसे तस लाल हो तावा ॥ तेहि तावापर जिव जो धरई । तलफि तलफि गरमीते भरई ॥ ऐसे जठर अग्नि तेहि दागे । तहैं जिव बिनय करे प्रभु आगे ॥ अबकि बार प्रभु मोहि वचावो । बाहरनकिस भजन मन लावो ॥ दुतिये मल अरु सूत्र मलीना । तामैं दूवा दुखिया दीना । भोगे दुःख महा दुरगंधा । तृतीये उलटा टांगा बंधा ॥ यहि विधि जीव नर्क तहैं भोगा । तीन ताप व्यापे सौ शोगा ॥ बार बार तहैं करे करारा । त्राहि नाथ कर मोर उबारा ॥ भजन छोड़ि न करो कछु आना । प्रभुकी भावभक्तिमें ध्याना ॥ तहैं जिवके सन्मुख प्रभु ठाढ़ा । दया करे सो दुख लखिगाढ़ा ॥ सो करार सुनि हरि हर्षाना । बन्धन काठके बाहर आना ॥ जबहि गर्भसे बाहर काढ़ा । भूला कौन मोहमद बाढा ॥ गर्भमें पोषे पालै आपै । प्रभुकी दया दुःख नहीं व्यापै ॥ पालि पोषि पुनि बाहर धरई । मातु पिताको आश्रित करई ॥ मातु पितहि सौपे शिशुसेवा । गुप्त हो तबहि परम गुरुदेवा ॥ मातु पिता तबलो तेहि पाला । जबलों नहीं बीते पन बाला ॥ बालापन जबही बितजाई । विद्या पाठ गुरु ढिग जाई ॥ मातुपिता गुरु आदि अवस्था । ताबिन जीव न पावै रस्ता ॥ पुनि गुरु कुटुम्ब जातिगण जोई । कुल मरजाद सिखावै सोई ॥