भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९५४ )

बोधसागर

४६

योगवाशिष्ठ द्वितिय मुमुक्षुप्रकरण चतुर्थसर्गः

वशिष्ठ वचन

दोहा—जीवन मुक्ति विदेहको, तू नहीं जाने हेत । सहित असम्यकज्ञानके, जान न रघुकुलकेत ॥ स्वसंवेदमें भेद जो, भाषत ज्ञान बिहीन । ज्ञानवन्तको भेव नहीं, सम्यकहृदय जेहि पीन ॥

चौपाई

सदाकाल ऐसहि चलि आई । निज निजमता मुनीश मिलाई ॥ कोई कह भिन्न जो मारग लेई । गुरु निज पक्षन विचलन देई ॥ उत्तम करनी जौँ नहीं करिये । तो नहीं उत्तम गुरुपद धरिये ॥ शम दमादि करि इन्द्री जीते । आवागौन दुसह दुःख बीते ॥ चारि खानि जिव जो तन धारी । मालुष प्रभु निज रूप सँवारी ॥ भक्ति हेत यह उत्तम देही । प्रभुहि बिसार जो धरि तनयेही ॥ सोई अधर्म आत्महत्यारा । नर तन पाय न काज सुधारा ॥

इति

अथ मनुष्यको नित्यकर्म वर्णन

चौपाई

भोरहि उठि नित कर्म करीजै । करि तन शुद्ध भजन चित दीजै ॥ प्रभु प्रति बिनय बचनते मांगे । महा दीन हूँ ताके आगे ॥ मोर मनोरथ कर प्रभु पूरा । दीनबन्धु कीजै दुख दूरा ॥ सर्व समय तुहि जग करता । तेरो हुकुम सर्वपर बर्ता ॥ मोर उधार करो प्रभु सोई । विघ्न बिहाय कृपा तौ होई ॥ गुरु अचारजको निज टेरे । सदा सहायक अपनो हरे ॥ बार बार कर प्रभु प्रति बिनती । यद्यपि सो न करे कछु गिनती ॥ कबहुके दाय़ा प्रभुकी होई । दुःखदरिद्र सब डारे खोई ॥ लामालाभ एक सम गनिये । सदाकाल प्रभु गुनगन भनिये ॥