कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९५३ )
बिन बोये कहु किनकिन लुनिया । सो जड़ जो यह ज्ञान न गुनिया ॥ ताते पुरुषारथको कीजै । दोऊ लोकमें सुयश लहीजै ॥ सर्वशास्त्र सदग्रंथ विलोका । जान्यौ सर्व धर्मको थोका ॥ तजि असार सार जो आही । सो पंडित मराल मति आही ॥ उत्तम धर्म धरे जो कोई । उत्तम करनी करिहैं सोई ॥ नीच धर्म जो कोई गहई । उत्तम करनी सो किमि लहई ॥ साधु पुत्र नहिं करे कुकर्मा । पुत्र असाधु कुकर्महि धर्मा ॥ कर्मयोनिजनिज मातुपिताका । जिव तेहि भली दृष्टिकरि ताका ॥ ऐसहि सब धर्मनके लोगा । करहि कर्म निज गुरु संयोगा ॥ शुद्ध अशुद्ध विचार न हारा । सो हंसा बिरला संसारा ॥ कहूं कहूं विपरीति देखावै । साधु सुअन असाधु कहावै ॥ कहूं भक्तभा सदन कसाई । पै यह कथा अनोख बताई ॥ धर्म तुच्छ गहि बड़ पद पावै । ऐसेहु कहूं कहूं देखलावै ॥ है परंतु यह अति अज युतरी । रसिकस्वाद कहैं दे कठपुतरी ॥ कोई चंडाल करे द्विज करनी । सो सतसङ्ग केर फल बरनी ॥ उत्तम कुलमें जो जिव होई । मध्यम करनी जाय बिगोई ॥ त्यागहि पक्ष साधु जो ज्ञानी । हो अपक्ष यह मुक्ति निशानी ॥ निजनिज गुरुपद गह सब आछे । यथा भेड़गण पालि न पाछे ॥ निज निज धर्म सत्य सब कहई । ताते परमपन्थ नहिं लहई ॥ जब काहू सच शंका आवै । निज पद पौर गुरु बैठावै ॥ रामचन्द्र मन संशय आई । देह विदेह मुक्ति अर्थाई ॥ मुनि वशिष्ठ निज ज्ञान सुनाये । अपनी ठौर फेर बैठाये ॥