कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 2034, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें(१९५६)
बोधसागर
४८
विद्या पाठक पहुँ जब जावै । विद्या सकल ताहिते पावै ॥ विद्यापढ़ि जब भयौ परवीना । धर्म अधर्म मर्म सब चीन्हा ॥ वेद शास्त्रको सबही छाना । तऊ न भक्तिभेद कछु जाना ॥ तब जिव संतकी संगति गहई । ताते ज्ञान लाभ सो लहई ॥ ज्ञानपाथ जब सतगुरु चीन्हा । ताके चरणमें चित दीन्हा ॥ आठ गुरुके नाम बखानो । जिनते जग जिव लाभ लहानो ॥ पहिले गुरु मातु पितु जानी । रज वीरजते देह उपानी ॥ दूजा गुरु है मनको दाई । गर्भमाह जिन युक्ति बनाई ॥ तीजा गुरु नाम जिन धारा । ताहि नाम ले लोग पुकारा ॥ चौथा गुरु जिन विद्या दीना । कुल मर्याद रीति सब चीन्हा ॥ पंचम गुरु जिन दीक्षा दीनो । रामकृष्णको सुमिरन कीनो ॥ छठये गुरु जिनभ्रम गढ़ तोड़ा । सबसे तोड़ एकसे जोड़ा ॥ सतवाँ गुरु जिन सत्य लखाया । जहाँको था तहँवा बैठाया ॥ एते गुरु हैं जक्त मझारा । जीवहि राह बतावनहारा ॥ अठये गुरु पारख पद बंदा । जाते कटे सकल यमफंदा ॥ भक्तिहि भक्ति भेद अधिकाई । तासु कथा कछु देहु सुनाई ॥ अक्षर तीन भक्तिमें धारी । ताको ऐसो अर्थ उचारी ॥ प्रथम भकारसो भव बतलावो । आवागमन जो दूर करावो ॥ दुतिये ककार करे कल्याना । तृतिये तो जिवको दे ज्ञाना ॥ भक्ती दोय प्रकार बखानो । विहित अविहित जाको जानो ॥ ऐसे प्रथम विहित निरतावो । वेद शास्त्र विधि भक्ति कमावो ॥ ताहि विहितमें चार प्रकारा । प्रथम कामना सहित उचारा ॥ जिमिहरिपदध्यायौवृजवनिता । निजमनोरथयुतभक्तिसोभनिता ॥ दुतिये बैरभाव करि ध्यावन । जिमि हरिनाकुस आदिकरावन ॥ तृतिये भयकरि भक्ति गहाई । जस मारीच भक्त रघुराई ॥