कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 2028, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १९५० )
बोधसागर
४२
भक्तिहि भक्ति भेद बहुतेरा । गहसो भक्ति भेट भवफेरा ॥ विमल भक्ति गहिये मन लाई । जाते त्रिगुनातीत कहाई ॥ आप आप जिव आप फँसाई । आपै बँधा आप दुख पाई ॥ जस क्रमयक जेहि कह खुसियारी । ताकी ऐसी कथा उचारी ॥ सो ऐसो निज भौन बनावै । आपको तामें आप फँसावै ॥ आप चरित ग्रह बंधै आपू । काहूको कछु दोष न पापू ॥ ताहीमें सो फँसि मरिजाई । विविध भांतिसे सो दुखपाई ॥ बंधा तौ पै खुलै न कोई । जब लगि सतगुरु कृपा न होई ॥ हाथ पांव पटकै औ रोवै । तब गुरुकृपा केर भ्रम खोवै ॥ जाति पांति कुल कानि गवावै । भली बुरी कछु चित्त नहिं ल्यावै ॥ सकल नेहको नाता तोरे । प्रीति सदा सतगुरुसे जोरे ॥ वेद कितोब शरा अरु सुन्नत । सो नहिं कछु निज मनमें उन्नत ॥ यह सबही दुनियांकी फांसी । ताते नहिं भेटे अविनाशी ॥
कवित्त-शरीअतकी सलाई जिव आँखन चलाई भय अंध यमबन्ध धोरवधन्धमें परत है । कोई कह हम हिंदू ही जो ऊंचे कुलबिंदू कोई कह हौ ईसाई ईशा आसराध रत है ॥ कोइ वह मुसलमान हौही साबित ईमान मारो काफिरन सारा जंग जेहाद करत है । नहिं चीन्है कोइ देव करे भरम कि सेव गुरु सैन बिन येव लड़ि लड़िके मरत है ॥
सत्यकबीर वचन
मुसलमानकी काटी चमड़ी हिंदूकी बेधे कान । कहे कबीर इस बोलतेको पहिचान हिंदूकी है मुसलमान ॥
चौपाई
जीवधर्म पुरुषार्थ गोगू । ताते सुख पावै सब लोगू ॥