कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९५१ )
कछुक कहो पुरुष पुरुषारथ । जो हित स्वारथ अरु परमारथ॥ शिव दधीच हरिचंद समाजा । बलि विक्रम करणादिक राजा ॥ सूरशाह सिकन्दर हातम । हनुमत भीष्म द्रोण भाषेतिम ॥ ब्रह्मा हरि शिव मनु सतरूपा । गोरखदत्त कि कथा अनूपा ॥ कौशिक व्यास वशिष्ठो नारद । शृंगी शुक् विज्ञान विशारद ॥ केते ऋषि मुनि करनी करहीं । कीरति जासु जक्त उच्चरहीं ॥ जीअत ही साधू जो मरेऊ । सूरसती शुभ करनी करेऊ ॥ साकजके हरि कानन कहई । स्वान शृंगाल पेट तेहि भरई ॥ सूर सन्त इमि करनी करही । जक्त जीव ले पार उतरही ॥ तप बल शेष धरे महि भारा । तपबल ब्रह्मा सिरजन हारा ॥ तप बल विष्णु जक्तको पोषै । तप बल शंभु ताहि पुनि सोषै ॥ तप आधार जक्त जगदीशा । तप बल जीव बने हैं ईशा ॥ जैसे जगमें सूर सयाना । निजभुजबल अरिदलदलनाना ॥ करि श्रम सुखी भये सब सोई । तन धन मोह स्यार सब रोई ॥ जहँ लगि जब विद्या चतुराई । पुरुषारथसे सब कछु पाई ॥ आलसी जीवको विद्या नाहीं । धन नहि होय अविद्या पाहीं ॥ निरधनको कोइ मित्र न होई । बिना मित्र निरबल नर सोई ॥ निरबलको सबही दुख घरे । दुखिया दीन तुच्छ जग हेरे ॥ पुरुषनको पुरुषारथ चाही । नारि पतिव्रत धर्म निबाही ॥ मृदु सजापर सोवनहारे । भय सो कीट पतंग बेचारे ॥ विविध प्रकार विषय जिन भोगा । अंतकाल सहसो सब शोगा ॥ मचे जबै घमसान लड़ाई । कोई धीर वीर ठहराई ॥ कैसहु महा महिष किन होई । जो रन तजिके भागे सोई ॥ कतल कैद हो राज विभंगा । कायर नहि देखे रनरंगा ॥ ऋषि मुनि शूर वीरकी करनी । कहलो कहो जाय नहि वरनी ॥