कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९४७ )
जौन धर्मगति चह चित सुनिया। ढोढों ताको पंडित गुनिया ॥ पक्षरहित जो बात बतावै। तामें कछू कसर जौ आवै ॥ तौ पूछो औरन बुध लोई। निजबल बुद्ध बतावे सोई ॥ एक कि भूल दूसरा कहई। यहिविधिचतुरशंकनिजदहई ॥ औरको धर्म औरते बूझै। ताको दिनदोपहर नहि सूझै ॥ वायस मिल वायसहि प्रशंसा। हम सम नहि ब्रह्माको वंशा ॥ हमसम और न बोल सुधारा। जाने कह कोकिला गँवारा ॥ सो सुनि भूलि जाहि जिवसंठा। जानन कागहि जो कटुकंठा ॥ जिमि उलूक निजपरको ठानू। कानते सुने न देखे भानू ॥ तामें सब कोइ मिथ्या करई। जगमें कतहु न सूरज अहई ॥ ताकी शास्त्र भरनको साचा। चमगुदरी उठि बोली वाचा ॥ सुनि लीजै उलूक मम आता। जो कछु कहो सत्य तुम बाता ॥ मैं कबहुँ दिनकर नहि देखा। कहै जक्त सब झूठा लेखा ॥ भरे बहुरिके ताकी साखी। आय छछन्दर ऐसे भाषी ॥ सत्य वचन तुम दोहुकी आही। दिनकर तीनकाल कहुनाही ॥ ऐसहि अंधहि अन्ध सराहत। जो दिनपतिहि दूरकरचाहत ॥ तिनके वचनमें जो जिव बंधे। तिनसमान सो सबही अन्धे ॥ जाधर पकै हरामको दाना। तिनको धर्म कर्म बिन माना ॥ जो कोई करे हराम कमाई। आप खाय अरु और खिलाई ॥ जो हरामको दाना देहे। ताको दंड आप शिर लैहे ॥ खाय हराम हरामही करि है। करि हराम भवसागर परि है ॥ जो कोई अन्न हरामको खाई। ताकी बुद्धि अन्ध हो जाई ॥ बुद्धि विभंग होय जब जाको। धर्मकथा भावै नहि ताको ॥ अन्धकार जब हृदयें घरे। शुद्धपन्थ सो कबहु न हेरे ॥ खाय हराम हरामी जायौ। मातु पिताकुलकानि गवायौ ॥