कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
३८
कहन सुनन कछु नाहिं, विचार हृदय निजआने ॥ आने हृदय विचार, चारु चिर चोर चपेरे । मूसे जो घर मोर भोर, निश ताको हेरे ॥
चौपाई
काल कराल आपही जानी । ब्रह्मा विष्णु महेश भवानी ॥ षट्दरशन सोई प्रभु थापा । सब पंथनमें आपै आपा ॥ मूसा ईशा महम्मद आदिक । सोई सब मतके मरजादिक ॥ सब धर्मनको सोइ अचारज । सबहीको कीने प्रभु कारज ॥ सब ही धर्म ताहिको जानी । प्रणवों सबहि मनोक्रम बानी ॥ सोई प्रभु सबही ये देखा । बपुरा जीव करे कह लेखा ॥
छन्द—आप खास है आप दार है आप खेल खेलायऊ । मलसोध जीव प्रबोध कीनो बौध होकर आयऊ ॥ जग जगन्नाथको माथ नावैं रूप और बनायऊ । थापे महात्म बौधको खुद बौधीदास कहायऊ ॥
चौपाई
दोय पुत्र ब्रह्माके भयऊ । यकसुरदुतियअसुर जो कहेउ ॥ सत्तोगुनी सुर कह सब कोई । विषय विकारी असुर सो होई ॥ तीन लोकमें विषय विकारा । चौथा लोक विषयते न्यारा ॥
सत्यकबीर वचन—चौपाई
विषय विकार मान मद जेते । सो सब प्रभु असुरनको देते ॥ जाने थोर बहुत जो कहई । तीनों काल मूर्ख सो रहई ॥ जेते जाने तेते जो भनिये । मध्यम गतिमें ताको गनिये ॥ जाने बहुत कहे जो थोरा । सोई ज्ञानी सब शिरमौरा ॥ सब धर्मनको भेद जो पावै । ताकी बुद्धि शुद्ध है जावै ॥ जाके धर्म ताहिंते जांचो । तब लखिपरे झूठ कह सांचो ॥