भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जीवधर्मयोग

( १९४५ )

फिरता खोरिन खोरि, कंठमें कर्म जझीरा । दर दर नाचत जाय, पाय तन मन बहु पीरा ॥ पीरा लह मतिमंद, होय नहीं बन्द खलासी । बंद दयाल जेहि काल, कालकी काटे फांसी ॥ कबीर खड़े बाजारमें, गल कट्टोंके पास । जो कोई करे सो भरेंगे, तुम क्यों भये उदास ॥ तुम क्यों भये उदास, भाष कर्महिको सारा । कर्मको रचित जहान, खान चहुँ कर्म सँवारा ॥ कर्म सँवारा दर्ब, सर्व जहाँलों जग दरसै । आतम तो निरलेप, एक सम सबमें सरसै ॥ हृदमें चल सो मानुवा, वेहह चले न कोय । हृद वेहहके बीचमें, रहौ कबीरा सोय ॥ रहौ कबीर सोय, कोय नहीं ताको परसै । परसै संत सुजान, ज्ञानके नैनन निरसै ॥ निरसै ज्ञानके नैन, परख पूरन सो पावै । जहाँ तहाँ दशै आप, ताप तिहुँ दूर बहावै ॥ हृदमें चलै सो मानुवा, बेहह चलै सो साध । हृद बेहह जो दोनों त्यागे, ताको मता अगाध ॥ ताको मता अगाध, आध अरु व्याध न लागे । कर्म जनित सब रोग, भोग भवमें नहीं पागे ॥ नहीं पागे भवभोग योग, जग नाता तोरे । टूटे न भजनको तार, प्रीति नामहिते जोरे ॥ हिंदू कही तो हौ नहीं, मुसलमान भी नाहिं । पांच तत्त्वको पूतला, खेलै गैबी माहिं ॥ खेलै गैबी माह गैबको गैबी जाने ।