कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९२५ )
चैतन्यमे जड़ रूप जड़, चित चेत निजु उर आनेऊ । शृंगार साजन लाल कहुँ, कुसु कानिकौ मन मानेऊ ।
इति काम
अथ क्रोधवर्णन-चौपाई
द्वितीये क्रोध महा बलवंता । सोसमस्त शुभ गुनको हन्ता ॥ जाको देखि बुद्धिवर कम्पत । रहै न निकट भाजिहो चंपत ॥ महा काल यह क्रोध उचारा । यह खल प्रकट होय जेहिबारा ॥ धर्मको लेश रंच नहीं रहई । यह अपराधी जप तप दहई ॥ प्रलय करे सतगुनहि विडारा । आप दाहि और न दुहि डारा ॥ वर्षहजार जो सुनि तप कीने । पलमें क्रोध अष्ट करि दीने ॥ नरकवास सुनि बरहि पठाई । कतहुँ न रही ज्ञान गहिराई ॥ तप जप कहाँ क्रोध जब होई । जिवको निश्चय नरक विगोई ॥ सकल धर्मकी धूल उडावै । क्रोधको अंधकार जब आवै ॥ अहंकार क्रोधादि विकारा । तुच्छ जीवमें अधिक निहारा ॥ कीडा एक रहे घासनमें । ऐसो क्रोध ताहिके मनमें ॥ जो कोई ताको परसे जाई । महा-क्रोध ताके उर छाई ॥ क्रोधितहै अस मनहि विचारी । छूवन हार को डारो मारी ॥ कूदे उछलै जो रन चलई । आपको अबल जानिके टलई ॥
इति क्रोध
अथ लोभवर्णन-चौपाई
तृतीये लोभकी कथा बखानी । शुभ गति लहै न लोभी प्रानी ॥ लोभी निशदिन माला फेरा । ताको पार होय नहीं बेरा ॥ सूम है नरक केर अधिकारी । जपतप कियहु न जन्म सुधारी ॥ लोभी जीव जेते जग माहीं । नरक हेत सबही सो आहीं ॥ लोभ ते शुभ करनी नहीं भावै । सोई सब अघकर्म करावै ॥