कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
६
सत्य पंथ पावे परखि, तब तेहि सतगुरु भेंट ॥ जबलों नहि सतगुरु मिले, तबलों ज्ञान न होय । ऋद्धि सिद्धि तपते लहै, मुक्ति न पावै कोय ॥
अथ जीवको सत्यस्वरूपी देह और ज्ञानको लोप होना और स्थूलदेह और संसारको भासना और नानाप्रकार की सृष्टिको फुरना और कर्मधर्मको विस्तार वर्णन ।
चौपाई
जीव धर्म बरनो अब सोई । सब भ्रम भासजाय जिहि खोई ॥ मोह रैन जग सोवन हारा । स्वप्नरूप यह जग विस्तारा ॥ नींद गई कछु दरसै नाही । सबही भर्म भास मिटि जाही ॥ छूटे सकल कालको फंदा । ज्ञान पाय जिव होय अनंदा ॥ जेते धर्म धर्म कोइ माहीं । जीव भर्म सबही ये आही ॥ सत्य असत्य सकल है माया । माया सब मिथ्या बतलाया ॥ मायाते सब काया जागी । तनमनधन उपाधि संगलागी ॥ जब अभाव कायाको होई । माया सबही जाय बिगोई ॥ प्रथहि सत्यरूप जिव रहेऊ । कच्छी देह बहुरि सो गहेऊ ॥ जिहि कारन सतरूप लोपाना । स्वसंवेदमें प्रथम बखाना ॥ अहंकार कर निरखि निकाई । ताते अपने रूप गवाई ॥ अपने रूपसे जब सो भटका । अतिशय दुःखद्वन्द्वमें अटका ॥ काल स्वरूपी है हंकारा । ताते प्रकट काल बरियारा ॥ काल कराल सोई अन्याई । सकल जीवको धरिधरि खाई ॥ यही जीवको बंधन कीने । भवसागरमें गोता दीने ॥ जाको हिय हंकाराते जूटे । निश्चय शीश तासुको टूटे ॥ अहंकार कह तीन प्रकारा । द्वै प्रकार कर अंगीकारा ॥