कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९१५ )
जीवन मुक्त केर गुन दोई । त्याग तीसरो कह श्रुति सोई ॥ प्रथम दृश्य जेती जग माहीं । मोते इतर और कछु नाहीं ॥ मैं अद्वैत परमात्म सारा । जीवनमुक्त परम हंकारा ॥ पुनि दुतिया हंकार बखानो । आपको जो अति सूक्ष्म जानो ॥ सर्वा भाग कच तेहैं कीन्हा । दोउ हंकार केर यह चीन्हा ॥ जीवनमुक्तको दोउ हंकारा । पुनि तीजा यहि भांति उचारा ॥ देहको जो आपा करि माना । ऐसी निश्चय तुच्छ बखाना ॥ जाने सत्य जो अपनी देहा । बन्धनको कारण है येहा ॥ शुद्ध आत्मते चित्तको फुरना । ताको नाम अविद्या धरना ॥ दोय भाँतिकी फुरना होई । यक संसार और कह जोई ॥ ताको नाम अविद्या राखा । आत्म और फुर अविद्या भाषा ॥ दोऊ स्पंद रूप उर मद्या । नाश अविद्या करे अविद्या ॥ जो विकल्पको कारण गाई । चित्त शक्ति क्षेत्रज्ञ कहाई ॥ नाम शरीर क्षेत्र सो जाना । तेहि अंतर बाहरको ज्ञाना ॥ नाम तासु क्षेत्रज्ञ कहीजै । सो जब सहित वासना भीजै ॥ आत्मते इतर रूप जो धारे । निश्चय कलना ताहि पुकारे ॥ निश्चय कलना जब सो गहई । बुद्धि नाम ताहीको कहई ॥ अहंभावते निश्चय जोई । पुनि संकल्प ताहिमें होई ॥ ताही कलनाको मन कहिये । चित्तशक्ति मनभाव जो गहिये ॥ घन विकल्प मनमाह जो बंधा । शब्द स्पर्श आदिक भे गंधा ॥ ताते इंद्रियानी फुरि आई । हाथ पांव प्राण आदि बताई ॥ इंद्रिन सहित देह तब भासे । चार खानकी थित कह तासे ॥ अचलते दृश्य दिशा फुरि आवा । तासु नाम संकल्प कहावा ॥ संकल्पहिते सकल पसारा । सबही स्थूल मूल हंकारा ॥ अग्निसवरूपी है हंकारा । ताते तमगुनको बिस्तारा ॥