भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९०४ )

बोधसागर

१४

चौपाई

साहेब चलो महल पग दीजै । हंसराज आपन कर लीजै ॥ दूजो चित कीजै जनि मोही । बारबार बिनवौं प्रभु तोही ॥ हम अजान कछु जानत नाही । तुम तो पुर रहे सबही माहीं ॥ कृपा करो मम बिथा विसारो । कालजाल जीवन निर्बारो ॥ चलि मंदिर पगु दीजे स्वामी । विनय करो सुनो अन्तर्यामी ॥ चले सुकृत महल पगु धारा । परजा रानी कुँवर भूआरा ॥ राजा रतनसिंहासन लाई । चरण बंदि सुकृताहि बैठाई ॥ सत्रह रानी आरति करहीं । बहुविध चितसों विनती धरहीं ॥ सकल जीव हैं शरण तुमारे । भवसागरते जीव उबारे ॥ हंसमती जेठी नृपराणी । साहेब चरण पखारे आनी ॥ हाथे चवँर कुँवर सब ढावत । एकहिटक सबे रूप निहारत ॥ ठाड़े राय जोर दौय पाना । साहेब कहो शब्द सहेदाना ॥ जेहि विध जीवसुक्त परभाऊ । सो साहेब मोहि भाषि सुनाऊ ॥

सुकृत वचन

छंद-वचन साहेब भाषे राजा, करहु आरति पावनं । चार गुरु किंकरहु साजी, कालकर्म नसावनं ॥ चित्र चै चित्र धोती, श्वेत वस्त्रहि लावनं । चित्र आरति साज राजा, करहु मंगल गावनं ॥ सोरठा-मेवा अष्ट प्रवान, चौका चंदन फेरहुं । दलझारी तहां आन, सवासेर महाँ चेतहुं ॥

चौपाई

तंदुल सवासेर ले आना । हार आरती कलश परवीना ॥ पुंगीफल अरु श्वेतहि पाना । चौकामहाँ धरो जो आना ॥ जिव पीछे नरियर कर लेहुं । जनियर सुकृत हाथ सो देहुं ॥