कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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गुरुमाहात्म्य
( १९०३ )
राजामोह वचन-चौपाई
एतिक शब्द सुनो मतिमाना । दृढ प्रतीति उपजा चित्त ज्ञाना ॥ तत्क्षण हस्ती तुरग मैंगवावा । धनसंपत्ति सब तुरत लुटावा ॥ एकचित्त होय राय औ रानी । कुँवर पचास सुर्त एक आनी ॥ पुत्र पचास संग वे रहई । एक सुर्त ते बाते करई ॥ इभि सतगुरुकी सेवा कीजे । जेहि परतीत अभयपद लीजे ॥ हे सद्गुरु जीवन सुख दाता । देत राज युग युग यह बाता ॥ नेगी योगी राय बुलावा । सकल नय तुम कहैं गोहरावा ॥ सद्गुरु शरण राय गहि पाई । जेहि अनुराग होय हो आई ॥ नेगी जाय कहे सब पासू । राजा गह साहेब विश्वासू ॥ प्रजा सकल कीन्हा मत एका । होय सुमति गहो शब्दहि टेका ॥ नेगा और प्रजा सब आये । राजासो उठि विनती लाए ॥ राय मता तुम है अवगाहा । हम सब जीव संग तुम आहा ॥ जो आयसु होवै महाराजा । सो हम करे मैटि कुल लाजा ॥
राजाका मोह वचन
सफल जन्म चाहो रे भाई । सद्गुरु शरण गहो लौलाई ॥ एक सुर्त हवौं दृढ नागर । गुरु रानिय हंसा होय आगर ॥ ऐसे गुरुसों विनती लाऊ । सकलो नय संग ले जाऊ ॥
छंद-सकल जीवन सुर्ति करके, राय चल हर्षित भये । जहाँ आप विराजे सुकृती, धाय पदपंकज नये ॥ जीव सब तुम शरण आये, आपने करि लीजिये । दया करि जिव बन्दि छोरे, अमर वासा दीजिये ॥
सोरठा-रानी सत्रह साथ, कुँवर पचास पद गहि लिये । सब जीवन नायेहु माथ, दरस दान प्रभु दीजिये ॥