भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९०२ )

बोधसागर

१२

छन्द-पाणि जोरे राय ठाढे दोहु पद मोहि पावनो ।

चरण कमलअधार तुम्हारे उभय ओर नभावनों ॥

छोड़ी नारी पुत्र पुत्री तुरग धन गज संपता ।

राज काज गुमान छोड़ैउ देखत तब पद मन रता ॥

सोरठा-अब प्रभु तुमते काज, यहि विध मनमें मानि तोहि ।

तजे लोक कुल लाज, सत्यपद चित अत्रुराग मोहि ॥

सतगुरु वचन-चौपाई

राजा विनय कीन्ह बहु मोरी । हृदय गुमान तजी है तोरी ॥

कैसे तोह काल उठ भाजा । ऐसी तब मति भई दराजा ॥

राजगुमान छोड़ि गहु चरणा । भेंटो तोर जरा औ मरणा ॥

सतगुरु चरण सीख मन लाई । काल प्रबल तब निकट न आई ॥

सत्रह रानी कुँवर पचासा । एकचित होय भर्म सब नासा ॥

जब लग भर्म मिटे हिय नाहीं । तोलग काल गहे जिव बाही ॥

गृह जिव सुमत होय सब एका । तब तुम गहो सन्तका टेका ॥

एकही सुतिं भक्ति होय ठाना । ते हंसा मम संग सिधाना ॥

बातन भक्ति होय नहीं राजा । बातन नाहे सरत कहु काजा ॥

जब तुम मोहत जो मद माया । तब तेहिले हम लोक सिधाया ॥

गृहसंपत सब देह लुटाई । राज काज छोड़ो चतुराई ॥

गज धन तुरग सकल तुम छोड़ो । दुर्लभ मारगमुख मति मोड़ो ॥

तब मैं तोहि अपनो करि जानो । भक्त प्रेमचित ज्ञान समानो ॥

छन्द-मोह मद अभिमान संयुत, लोभ तृष्णा अतिबली ॥

कामि कामिनी करत कीडा, देवव्रह्मणि जिव सब छली ॥

वह सकल त्यागै सबू पागै, ज्ञान अविचल पद गहे ॥

ताहि जीवले लोक पहुँचे, काल कर तेहि ना गहे ॥

सोरठा-सो जीव सँग मम होय, सकल त्याग एकनाम गह ।

और आश नहीं कोय, शब्द गहे मन हर्षिके ॥