कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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गुरुमाहात्म्य
( १९०१ )
श्वेत अंग कीन्हेउ अति पावन । बैठे अवर सुकृत मन भावन ॥ देखि लोग सब भये अंचभा । हर्षित राय चरण गहियंभा ॥ बहुतक साधू मम गृह आया । ऐसे साधू नहीं हम पाया ॥ को तुम आहु कहांते आई । आपन परचे कहो बुझाई ॥
सुकृत बचन
जो तुम बूझहु राय सुजाना । आपन कथित कहाँ सैदाना ॥ अमरलोकते पुरुष पठाई । जीव उबारन हम जग आई ॥ आए उत्तर दिशि चितलावा । श्रीनग्र तुम कारण आवा ॥ वद्रीनाथ आवे तुम जहिया । पापपुञ्ज सब भागे तहिया ॥
छन्द-जीव सबसों कहेउ घरघर, शब्द काहु ना गहे ।
गयउ वद्रीजीको मंदिर, चित्त मम हर्षित अहे ॥
दीन्ह मस्तक हाथ तत्क्षण, रूपपारस जिन दियो ।
प्रीति तुव हिय देखि दृढ़ होय, दरश अव तोकह दियो ॥
सोरठा-भक्त हेतु तुव अंग, साधन प्रिय तुव हिये अहे ।
निश साधनके अंग, तातचित तोहे राचहे ॥
चौपाई
एतिक बचन राय सुने जबहीं । राजा बचन माहि विहसि तबहीं ॥ निःसंगत जिमि उगे अकाशा । कोक शोक मिट होत हुलासा ॥ इमि राजा दर्शन आनंदा । जिमि चकोर पायो निशिचन्दा ॥ रानी राय चरण उर धारा । क्रिया कीन्ह मम ब्रिथा बिसारा ॥ मोहि सनाथ कीन्ह प्रभु पावन । मग अकर्म हारा मनभावन ॥ आपनकर कीजे मोहि दाय। हम चीन्हा यह तुम्हरी माया ॥ सकलजीव चकित मन भायउ । नगर लोग सब देखन धायउ ॥ तरुण वृद्ध औ बालक धाए । सबही देखि प्रदक्षिण लाए ॥ सन्त वृद्ध बहु जुरे अपारा । अस्तुति करे सकल बहु वारा ॥