भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 1979, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1979

११

गुरुमाहात्म्य

( १९०१ )

श्वेत अंग कीन्हेउ अति पावन । बैठे अवर सुकृत मन भावन ॥ देखि लोग सब भये अंचभा । हर्षित राय चरण गहियंभा ॥ बहुतक साधू मम गृह आया । ऐसे साधू नहीं हम पाया ॥ को तुम आहु कहांते आई । आपन परचे कहो बुझाई ॥

सुकृत बचन

जो तुम बूझहु राय सुजाना । आपन कथित कहाँ सैदाना ॥ अमरलोकते पुरुष पठाई । जीव उबारन हम जग आई ॥ आए उत्तर दिशि चितलावा । श्रीनग्र तुम कारण आवा ॥ वद्रीनाथ आवे तुम जहिया । पापपुञ्ज सब भागे तहिया ॥

छन्द-जीव सबसों कहेउ घरघर, शब्द काहु ना गहे ।

गयउ वद्रीजीको मंदिर, चित्त मम हर्षित अहे ॥

दीन्ह मस्तक हाथ तत्क्षण, रूपपारस जिन दियो ।

प्रीति तुव हिय देखि दृढ़ होय, दरश अव तोकह दियो ॥

सोरठा-भक्त हेतु तुव अंग, साधन प्रिय तुव हिये अहे ।

निश साधनके अंग, तातचित तोहे राचहे ॥

चौपाई

एतिक बचन राय सुने जबहीं । राजा बचन माहि विहसि तबहीं ॥ निःसंगत जिमि उगे अकाशा । कोक शोक मिट होत हुलासा ॥ इमि राजा दर्शन आनंदा । जिमि चकोर पायो निशिचन्दा ॥ रानी राय चरण उर धारा । क्रिया कीन्ह मम ब्रिथा बिसारा ॥ मोहि सनाथ कीन्ह प्रभु पावन । मग अकर्म हारा मनभावन ॥ आपनकर कीजे मोहि दाय। हम चीन्हा यह तुम्हरी माया ॥ सकलजीव चकित मन भायउ । नगर लोग सब देखन धायउ ॥ तरुण वृद्ध औ बालक धाए । सबही देखि प्रदक्षिण लाए ॥ सन्त वृद्ध बहु जुरे अपारा । अस्तुति करे सकल बहु वारा ॥