भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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गुरुमाहात्म्य

( १९०५ )

कञ्चन कलस पांच धरो वाती । ज्वलित कपूर धरो बहु भांती ॥ दल अमृतकी कञ्चन झारी । डार सुगन्ध धरो तेहि वारी ॥ खरचा सात मँगगवहु सेता । गासे सात वजन कर लेता ॥ आगरु साते ताहि प्रवाना । सो खरचा ले दल ये आना ॥ खरचा सात धरे दल जबही । धर्म देख थरहर भये तबही ॥ कनक पटम्बर कीन्ह सिंहासन । तापर साहेब कीन्हे आसन ॥ आनंद मंगल कीन्ह उचारी । राय धरा नरियर तेहि वारी ॥ युथ युथ जूरे जीव सब आए । नरियर धरे सुकृत मन भाए ॥ सत्रह रानी सुत सुत नारी । ते सब आय चरण चितधारी ॥ युग बंधे राजा अरु रानी । सोविधिसकलजीवमिलजानी ॥ भावरि देय प्रदक्षिण दीन्हा । हंस उबार अपनकर लीन्हा ॥

छंद-तब चरण मृदु मंजुल पावन अतिहि सुहावन भावन । अमि मूरतिसूरत धारत त्रिविध ताप नसावन ॥ आदि अनंत अनादि पुरुष करहु दया जाहिको । जीव जेहि तुम पकरि बहियां कालग्रस नहिं ताहिको ॥

सोरठा-तुम प्रभु शब्दस्वरूप, अमित भाव लखि ना तरे । तुच्छ बुद्धि मनरूप, जीवनपकरि नचावहुँ रे ॥

चौपाई

दीजे मोहि शब्द सहिदानी । तुमते नहीं बड़ो कहु दानी ॥ जेते जीव अमरघर जाई । होइ अमर भव बहुरि न आई ॥

सुकृतवचन

राजा रानी तृणहि तूरावा । त्रिगुण पदवितें जीव बचावा ॥ कुँवर पचास रायमत लीन्हा । हर्षित हाय सुमत इन कीन्हा ॥ प्रजा सकल नग्रनके आवा । सत्य सुकृतके दर्शन पावा ॥