कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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४२-सत्यगुरु ( कबीर साहब ) की वाणीका पाठ करना, बारम्बार मनन करना, उनके आशयके ऊपर विचार करना, उसके भेदको भली प्रकार सोचना, समझना और सदाकाल उन्हींका चिंतन रखना उनके आशय समझनेमें कोई भी युक्ति उठा नहीं रखना । सत्यगुरुके शब्दोंको यथा अवसर गाना और कीर्तन करना, सत्य गुरुकी प्रशंसा और प्रार्थना सदा करते रहना ।
४३-जितने धर्म संसारमें प्रचलित हैं सबके आचार्य कबीर साहब हैं परन्तु मुक्तिदाता तो स्वयम् ( कबीर साहब ) और चार गुरु तथा उनके वशोंकोही ठहराया है, अन्यको नहीं ।
४४-किसीको कभी शाप न देना, किसीको कुवचन न कहना, न किसीका अहित चिंतन करना ।
४५-परमात्माको सर्वत्र पूर्ण जानना । किसी प्राणीको भी दुःख देनेको ईश्वरको दुःख देनेके तुल्य जानना ।
४६-अभिमानी कभी परमात्माको व्यापक नहीं देख सकता ।
४७-गुरुकी आज्ञाकारिता परम तपस्या है ।
४८-जबतक शरीरसे लाड़ प्यार है उसकी पोषणमें वृत्ति लगी है तबतक आज्ञाकारिता असम्भव है ।
४९-मूर्ख, शठ और विद्याहीनको मुक्तिपद कदापि नहीं मिलता ।
५०-जबतक शरीरका भय और चिंतन है अर्थात् देहाभिमान है तबतक विदेह कदापि प्राप्त नहीं हो सकता । जो स्वयम् विदेह हो वही विदेहको प्राप्त हो ।
कबीर साहबके लोक और हंसोंका वृत्तांत
कबीर साहबका वह लोक है जिसका गुण कहने और सुननेके बाहर है, केवल स्वसंवेद थोड़ासा विवरण करता है