भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर चरित्रबोध

( १८८५ )

जिस समय उस लोकको हंस चलते हैं उस समय उनके प्रतापका वर्णन कुछ किया नहीं जा सकता है, उनके सौन्दर्यका बखान किससे हो सकता है जिनका एक एक बाल ऐसा देदीप्यमान और तेजमय है कि, जिसके सामने करोड़ों सूर्य और चन्द्र छिप जावें, उनके सौन्दर्यका वर्णन कौन कर सके उन हंसोंके मनमें तनिक भी बासना नहीं रहती है और निरंजन, आद्या, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, ऋषि, मुनि इत्यादि वासनाके ही अधीन हो वारम्बार संसारमें जन्म लेते हैं। राम कृष्ण सिद्ध साधु इत्यादि सब धर्म वासनासे जन्म लेते हैं।

जिस समय कोई मनुष्य मरता है तब उत्तरकी ओर होकर ऊपर चलकर प्रथम विष्णुके निकट अपने पाप पुण्यका लेखा देनेके निमित्त वैकुण्ठको जाता है और जब हंस कबीर चलते हैं तब सत्यगुरुके शब्दके लवद्दारा अपने पूर्ण बलसे ऊपर की ओर चढ़े चले जाते हैं जब ब्रह्माण्डके पार हुआ चाहते हैं तब धर्मरायकी तीन सौ साठ कन्या मिलती हैं जिनके वस्त्र आभूषण और सौन्दर्य आदिका मैं क्या विवरण कहूँ? सत्यकबीरके अतिरिक्त ऐसा कोई भी तीनों लोकोंमें नहीं है कि, उनको देखकर आसक्त न हो जावे; वे कन्यायें उस स्थानपर इस कारण नियत की गई हैं कि, हंस कबीरको अपने जालमें फँसालेंवे जब वे हंस कबीरके निकट जाती हैं तब नाना प्रकारके हावभाव कटाक्ष द्वारा उनको मोहित करना चाहती हैं। परन्तु वे उनकी ओर तनिक भी ध्यान नहीं देते! वे कहते हैं कि, दूर हो और चली जा तुम्हारी तनिक भी इच्छा तथा कामना हमको नहीं है। तब वे निराश होकर लौटती हैं। भला मकड़ीके जालमें भारी पदार्थ कैसे फँस सकते हैं। जब