कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ
पृष्ठ 1967, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1967
१०५
कबीर चरित्रबोध
( १८८९ )
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ जहाँ रात न दिन है व नहीं सूरज चन्दा । सोहँग दुरै चैवर करे पुरुष अनन्दा ॥ यक सूरत सारे न खुदावन्द न बन्दा । इस मंजिल नजदीक नहीं कालका फन्दा ॥ जिस लोक महेशःको परमहंस पधारै । चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥ सतगुरुकी शरण लेके चलो बहके उसपार । वह कादिर मुतलक हुवा जिस जीवका मददगार ॥ कर पलमें सुबुकदोष उठा उसका गराँ बार । पहुँचावे वतनमें न बुतनमें होवे औतार ॥ आजिज से गुनहगार कतारोंको जो तारे । चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥
इति कबीर चरित्र बोध समाप्त