कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
१०५
कबीर चरित्रबोध
( १८८९ )
चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥ जहाँ रात न दिन है व नहीं सूरज चन्दा । सोहँग दुरै चैवर करे पुरुष अनन्दा ॥ यक सूरत सारे न खुदावन्द न बन्दा । इस मंजिल नजदीक नहीं कालका फन्दा ॥ जिस लोक महेशःको परमहंस पधारै । चल हंस अचल मोलि दो मावाय हमारे ॥ सतगुरुकी शरण लेके चलो बहके उसपार । वह कादिर मुतलक हुवा जिस जीवका मददगार ॥ कर पलमें सुबुकदोष उठा उसका गराँ बार । पहुँचावे वतनमें न बुतनमें होवे औतार ॥ आजिज से गुनहगार कतारोंको जो तारे । चल हंस अचल मोलिदो मावाय हमारे ॥
इति कबीर चरित्र बोध समाप्त
A black and white illustration of a potted plant, possibly a fern or a similar leafy plant, centered within a decorative border. The plant is in a rectangular pot and has many long, pointed leaves. The border is a repeating pattern of small, stylized floral or star-like shapes.
अथ गुरुमाहात्म्य-प्रारंभः
भारतपथिक कबीर पंथी- स्वामी श्रीयुगलानन्द द्वारा संशोधित
मुद्रक व प्रकाशक
गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, अध्यक्ष-“लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर”-प्रेस
कल्याण-बम्बई.
A circular emblem or seal, possibly a library or institutional logo, featuring a central design surrounded by a ring of text or decorative elements.
THE UNIVERSITY OF TORONTO
LIBRARY
1911
UNIVERSITY OF TORONTO LIBRARY
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
The image shows a very faint, light green watermark of the Indian Government Emblem (Lion Capital of Ashoka) centered on a light background. The emblem features four lions standing on a circular base, with the Ashoka Chakra (a wheel with 24 spokes) in the center. Above the lions is a Dharmachakra (a wheel with 14 spokes). The entire watermark is extremely faded and barely visible against the light background.
सत्यसुकृत, आदि अदली, अजर, अचिन्त, पुरुष, मुनीन्द्र, करुणामय, कबीर, सुरति योग संतान, धनी धर्मदास, चुरामणिनाम, सुदर्शन नाम, कुलपति नाम, प्रबोध गुरुबालापीर, केवल नाम, अमोल नाम, सुरतिसनेही नाम, हक्क नाम. पाकनाम, प्रकट नाम, धीरज नाम, उग्र नाम, दया नामकी दया, वंश- व्यालीसकी दया
अथ श्रीबोधसागरे
अष्टविंशतित्तरंगः
अथ गुरुमाहात्म्य-प्रारम्भः
★
धर्मदास वचन
धर्मदास कर जोरे ठाढ़े । एकटक सुरति प्रेमचित बाढ़े ॥ करहु दया तुम निर्गुण स्वामी । वचन सुनावहु अन्तर्यामी ॥ किमि गुरु ध्यान बन्दना कीजे । होहि सुदृष्टि मोहि कहि दीजे ॥ जा पद जीव तरे भवसागर । शोक हिये हंसनपति आगर ॥ तेहि मगाशिष गुरुपद लागू । नहि धन धाम होय अनुरागू ॥
( १८९६ )
बोधसागर
६
सतगुरुवचन
धर्मदास बूझे भल ज्ञाना । तुमसे कहौं सत्य चितमाना ॥ साहेब सम सतगुरु कहैं जानो । दुजी भावना चित्त न आनो ॥ जब गुरु मिले करे परनामा । छन छन पल पल आगे जामा ॥ गुरु चाहत जो शिष्य हे नागर । होय अधीन शीख्य मतिआगर ॥ शीष्य सुमिरि निशदिन अनुरागा । पानदेन वाइस मतभागा ॥ सद्गुरु शब्द गहे टकसारा । भवजल जीव उतारे पारा ॥ सद्गुरु कर्म देखि जिव केरा । तत्क्षण गुरु करहि निर्वेरा ॥ तिनुका तोरी देइ जिव याना । फिर नहिं जन्म धरे भवआना ॥ तुरते तब पावे टकसारा । होय हिरण्मय हंस हमारा ॥ वर्णभेद निर्णयकरि पावे । कालत्रास तेहि निकट न आवे ॥ प्रथमहि गुंजवरणको लेषा । सत्यशब्द गुरु कहै विशेषा ॥ गुंजवरण जो हंसा होई । गुरुलहि तेई हंस समोई ॥ गुंजवरण पावे परवाना । राय बंकेज हंस मगु जाना ॥ कर्म देखिकै तिरन तुरावे । राय बंकेजको पान जो पावे ॥ सारखी-देहि पान जेहि जीवको, कर्म कटा तेहि जान । हंस होय सत्यपुर चले, सद्गुरु वचन प्रमान ॥
चौपाई
वरण भेद पावही प्रवाना । सो हंसाकर लोक पयाना ॥ पावे दर्श पुरुषके जाई । रहे अटल पुनि छत्र तनाई ॥ करे अटल युग युगका राजू । जिन पाया निर्णयका साजू ॥ होय बहुरि स्थिर गर्भ न आवे । वरण भेद परवाना पावे ॥ सो गुरुकी पुनि आरति कीजे । चरण पखारि चरणरज भीजे ॥ सो रज हिय अरु शीश चढावे । कालप्रबल तेहि निकट न आवे ॥ ऐसे गुरु मुक्तिके मूला । तेहि पद सम दूजा नहिं वूला ॥
७
गुरुमाहात्म्य
( १८९७ )
गुरुसाहेब जाने हड़ हीता । जेहि परताप काल जग जीता ॥ शिष्य जो करे गुरुसे चोरी । अजगर योनि होय तेहि केरी ॥ शिष्य जो गुरुसे अन्तर करई । जन्म जन्म चौरासी परई ॥ गुरु निंदा श्रवण सुने जबही । वेगिहि ठांव तजे पुनि तबही ॥ जेहि कानन सुमिरन सुनि लीन्हा । निंदा सुनि चह मूँदन कीन्हा ॥
साखी-गुरुनिंदा श्रवणन सुने, तत्क्षण छोड़े ठांव ।
जेहि कान गुरुस्तुति सुने, निन्दा निकट न ल्याव ॥
गुरुसे द्रोही शिष्य जो, संतन कीन्ह विरोध ।
सो चौरासी भर्म ही, भारे काल करि क्रोध ॥
चौपाई
गुरुकी आशीष नहीं मानी । करि अभिमान कालसम जानी ॥
गुरुहि छोट करे शीष समाई । सोई जन्म जन्म भरमाई ॥
शिष्य जो भोगे गुरुकी नारी । होइ अजगर बसै विपिन मँझारी ॥
तन छूटै धरि वृष अवतारा । लहि अनेक विधि पाप विकारा ॥
काया छूटै वृभषकी जहिया । स्वानजन्म पुनि पावे तहिया ॥
भूँकि भूँकि जग मरे गँवारा । विषय पाप पचवे संसारा ॥
झूकर जन्म होय पुनि ताही । सकल अपावन निशिदिन खाही ॥
निलज होय योनिनमें परई । लख चौरासी भ्रमता फिरई ॥
साखी-पाप विषय नहीं परिहरे, मरि मरि ले अवतार ।
कहैं कबीर धर्मदाससों, ऐसे कर्म अपार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास विनती अनुसारी । हे सदगुरु मैं तुम बलिहारी ॥
तेहि जीव किमि होय उबारा । फांसी डारे काल अपारा ॥
सो साहब कहिये मोहि साँचे । जैसे जीव कालसे बाँचे ॥
सदगुरु वचन
धर्मदास बूझेहु भल बाता । सो अब तोहि कहों विरुयाता ॥
नं. ११ बोधसागर - ५
( १८९८ )
बोधसागर
८
कुटिल है जीव कर्म अति आगर । तासु कथा भाषों सुनो नागर ॥ चौथी पीढ़ी अंश मम होइहैं । नाम प्रमोददास जग पैहैं ॥ दास प्रमोद प्रकटि संसारा । लेखा शब्द देहि टकसारा ॥ जीव अंध शरण कर्म जैहैं । तासु कर्म सब दूरि बहैहैं ॥ नरियर हाथ लेहि पुनि जाका । तिरन तुराव कर्मगति ताका ॥ ता पीछे परवाना देहैं । हंस उबार अपन कर लेहैं ॥ सत्यशब्द चले टकसारा । पलमें हंस उतारे पारा ॥ दास प्रमोद प्रकटे जगमाहीं । बिछुरे हंस लोककूं जाहीं ॥ अमृत धारी देहि प्रवाना । सो हंसा पुरुष मनमाना ॥ सारखी-कर्म कटे तेहि जीवके, जाकहैं देहे प्रान । ऐसे ऐसे पुरुषके, हंस करे निर्वान ॥
चौपाई
जेहि जीव देहैं कड़हारी । सत्यशब्द देहैं टकसारी ॥ ध्यानभेद भाषों समुझाई । निर्णय देख हंस सुकर्ताई ॥ निर्णय पाय करे कड़हारी । धर्मराय सुख जरत उवारी ॥ सो कड़िहार सत्य धर्मदासू । जीवन कर्म करे जो नासू ॥ निर्पवनहिंका करे विचारा । तासु जीव हम पार उतारा ॥ निर्पवनहि ले गहिहे हाथा । " " " " ॥ छेहत्तरके आगे भाषा । तावट हंसलोक ले राषा ॥ सोई पवन हंसन रखवारा । भवजल जब उतारे पारा ॥ सारखी-छेहत्तरके आगे, सतहत्तर गह योग । जरा मरण भ्रम मेटके, कबहि न व्यापै सोग ॥
चौपाई
सात पाँच नरियरमें नाहीं । ता सजीव जानें गहिहो वाहीं ॥ ताहे जीव आपना जानी । कर्मरूपता कर्म न मानी ॥
९
गुरुमाहात्म्य
( १८९९ )
युग बंधन पाये जो पाना । हंस होय सत्यलोक समाना ॥ दृढ प्रतीत होइ करे गुरुसेवा । भक्तिहीन गुरु पावन देवा ॥ साखी-दीन्ह नील जेहे नानहुँ, भक्तिभाव अनुराग । निश दिन गुरु चरण गहे, हंस होवे बड़भाग ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास कहे हंसन पति राजा । भलविध कीन्ह हंसको काजा ॥ तुमहि पुरुष हो तुमही ज्ञानी । तुमहीं वंश रूप हम जानी ॥ पुरुष रूप तुम उत्पन्न कीन्हा । वंश रूप जग तारण लीन्हा ॥ सतयुग कौन जीव जग रेहू । केहि विध हंसन आन उबारेहू ॥ कौन नग्र कहवा तुम गयऊ । केतिक जीव शरण तुम भयऊ ॥ कैसे सेवा कीन्ह बनाई । हिये दलक होकै समुझाई ॥
सतगुरु वचन
पुरुष अवाज आये भव सागर । सत्य सुकृत हम नाम उजागर ॥ उत्तर दिशा गयउ निज ठामा । श्रीनग्रे पहुँचेउ तब ग्रामा ॥ राय मोहम तहाँके राजा । भक्त करत भेटत कुल लाजा ॥ सुन्दर बदन रूप अधिकार्ई । परजा सुखी राजसुख पाई ॥ शुचि संयमआत्मज्ञान उजागर । दीन लीन्ह संतन सो आगर ॥ करत खोज साधू सो प्रीती । अति आनंदरूप सुखरीती ॥ भांति भांतिके मंडप छावा । साधु संत आदरके लावा ॥ करे महोत्सव साधु बोलाई । प्रेम पुरुष निशदिन मनभाई ॥ निश दिन वेद कथासों प्रीती । कौन भांति जिव यमसों जीती ॥
साखी-खोज करत चित व्याकुल, दृढत सगलो भेष ।
सिरजनहार बतावई, सबही कहत अलेष ॥
चौपाई
चले राय तहाँ बद्दीनाथा । सुत सुमित्र लिये रानी साथ ॥
( १९०० )
बोधसागर
१०
साधुरूप हमही कर लीन्ह। रायसंग तत्क्षण पग दीन्ह। ॥ गये नृप जहवाँ प्रीतम विराजा। भांति भांतिकर बाजन बाजा ॥ कछुक द्रव्य ले आगे राधा। विनय दंडवत बहुविध भाषा ॥ होत कुलाहल मंगल चारी। भांति भांति गावे नर नारी ॥ बन्नीपरश रायकर आसन। बैठ नृपति जाय सिंहासन ॥ हम जीवन सौश्रव्य पुकारा। धार धार फिरे सेवनके धारा ॥ चेतहु प्राना शब्द सँदेश। चलो जहां तहां हंस नरेशा ॥ तहवाँ जाय बहुरि नहिं आवे। एक चित होय नाम लोलावे ॥ सकल जीवसे कहेउ चेताई। एको जीव नहिं पतिआई ॥ सात दिवस रायहि तब बीता। कौतुक एक तहां हम कीता ॥
छंद-गयउ मंडपपास तत्क्षण जहां बन्नीनाथ हो। रूप पाहन कीन्ह पारस दिनेहु मस्तक हाथ हो ॥ बीति निशि भिनसार भो तब जाय पंडा पूजही। करत आरति भयउ चक्रित देखादे जावे तब बूझही ॥ सोरठा-आरत आहेक घात, प्रतिमापद कंचन भयो। कहत सकल सो बात, राजारामदास जाय जनायो ॥
चौपाई
राजा सुनत हर्षि चित दीन्हौ। प्रभु मायाको जानन लीन्हौ ॥ भयो अचम्भो लोगन सबही। लीला आप कीन्ह प्रभु अबही ॥ स्तुति करत बहुत हर्षाहीं। सत्य भेष कोइ चीन्हत नाहीं ॥ राजा दिल करे सब साधू। चले संत जुथ जुथ मतबाधू ॥ राजा झारी लीन्हे हाथा। सकल भेद कह नावहि माथा ॥ रानी साधुन चरण परवारा। राजा आपन कर जल ठारा ॥ सकल भेष कहे बैठे जेवनारा। जय जय मंगल होत उचारा ॥ तब हम ताहां बैठे जाई। पूर्ण शशी सम रूप दिखाई ॥
११
गुरुमाहात्म्य
( १९०१ )
श्वेत अंग कीन्हेउ अति पावन । बैठे अवर सुकृत मन भावन ॥ देखि लोग सब भये अंचभा । हर्षित राय चरण गहियंभा ॥ बहुतक साधू मम गृह आया । ऐसे साधू नहीं हम पाया ॥ को तुम आहु कहांते आई । आपन परचे कहो बुझाई ॥
सुकृत बचन
जो तुम बूझहु राय सुजाना । आपन कथित कहाँ सैदाना ॥ अमरलोकते पुरुष पठाई । जीव उबारन हम जग आई ॥ आए उत्तर दिशि चितलावा । श्रीनग्र तुम कारण आवा ॥ वद्रीनाथ आवे तुम जहिया । पापपुञ्ज सब भागे तहिया ॥
छन्द-जीव सबसों कहेउ घरघर, शब्द काहु ना गहे ।
गयउ वद्रीजीको मंदिर, चित्त मम हर्षित अहे ॥
दीन्ह मस्तक हाथ तत्क्षण, रूपपारस जिन दियो ।
प्रीति तुव हिय देखि दृढ़ होय, दरश अव तोकह दियो ॥
सोरठा-भक्त हेतु तुव अंग, साधन प्रिय तुव हिये अहे ।
निश साधनके अंग, तातचित तोहे राचहे ॥
चौपाई
एतिक बचन राय सुने जबहीं । राजा बचन माहि विहसि तबहीं ॥ निःसंगत जिमि उगे अकाशा । कोक शोक मिट होत हुलासा ॥ इमि राजा दर्शन आनंदा । जिमि चकोर पायो निशिचन्दा ॥ रानी राय चरण उर धारा । क्रिया कीन्ह मम ब्रिथा बिसारा ॥ मोहि सनाथ कीन्ह प्रभु पावन । मग अकर्म हारा मनभावन ॥ आपनकर कीजे मोहि दाय। हम चीन्हा यह तुम्हरी माया ॥ सकलजीव चकित मन भायउ । नगर लोग सब देखन धायउ ॥ तरुण वृद्ध औ बालक धाए । सबही देखि प्रदक्षिण लाए ॥ सन्त वृद्ध बहु जुरे अपारा । अस्तुति करे सकल बहु वारा ॥
( १९०२ )
बोधसागर
१२
छन्द-पाणि जोरे राय ठाढे दोहु पद मोहि पावनो ।
चरण कमलअधार तुम्हारे उभय ओर नभावनों ॥
छोड़ी नारी पुत्र पुत्री तुरग धन गज संपता ।
राज काज गुमान छोड़ैउ देखत तब पद मन रता ॥
सोरठा-अब प्रभु तुमते काज, यहि विध मनमें मानि तोहि ।
तजे लोक कुल लाज, सत्यपद चित अत्रुराग मोहि ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
राजा विनय कीन्ह बहु मोरी । हृदय गुमान तजी है तोरी ॥
कैसे तोह काल उठ भाजा । ऐसी तब मति भई दराजा ॥
राजगुमान छोड़ि गहु चरणा । भेंटो तोर जरा औ मरणा ॥
सतगुरु चरण सीख मन लाई । काल प्रबल तब निकट न आई ॥
सत्रह रानी कुँवर पचासा । एकचित होय भर्म सब नासा ॥
जब लग भर्म मिटे हिय नाहीं । तोलग काल गहे जिव बाही ॥
गृह जिव सुमत होय सब एका । तब तुम गहो सन्तका टेका ॥
एकही सुतिं भक्ति होय ठाना । ते हंसा मम संग सिधाना ॥
बातन भक्ति होय नहीं राजा । बातन नाहे सरत कहु काजा ॥
जब तुम मोहत जो मद माया । तब तेहिले हम लोक सिधाया ॥
गृहसंपत सब देह लुटाई । राज काज छोड़ो चतुराई ॥
गज धन तुरग सकल तुम छोड़ो । दुर्लभ मारगमुख मति मोड़ो ॥
तब मैं तोहि अपनो करि जानो । भक्त प्रेमचित ज्ञान समानो ॥
छन्द-मोह मद अभिमान संयुत, लोभ तृष्णा अतिबली ॥
कामि कामिनी करत कीडा, देवव्रह्मणि जिव सब छली ॥
वह सकल त्यागै सबू पागै, ज्ञान अविचल पद गहे ॥
ताहि जीवले लोक पहुँचे, काल कर तेहि ना गहे ॥
सोरठा-सो जीव सँग मम होय, सकल त्याग एकनाम गह ।
और आश नहीं कोय, शब्द गहे मन हर्षिके ॥
१३
गुरुमाहात्म्य
( १९०३ )
राजामोह वचन-चौपाई
एतिक शब्द सुनो मतिमाना । दृढ प्रतीति उपजा चित्त ज्ञाना ॥ तत्क्षण हस्ती तुरग मैंगवावा । धनसंपत्ति सब तुरत लुटावा ॥ एकचित्त होय राय औ रानी । कुँवर पचास सुर्त एक आनी ॥ पुत्र पचास संग वे रहई । एक सुर्त ते बाते करई ॥ इभि सतगुरुकी सेवा कीजे । जेहि परतीत अभयपद लीजे ॥ हे सद्गुरु जीवन सुख दाता । देत राज युग युग यह बाता ॥ नेगी योगी राय बुलावा । सकल नय तुम कहैं गोहरावा ॥ सद्गुरु शरण राय गहि पाई । जेहि अनुराग होय हो आई ॥ नेगी जाय कहे सब पासू । राजा गह साहेब विश्वासू ॥ प्रजा सकल कीन्हा मत एका । होय सुमति गहो शब्दहि टेका ॥ नेगा और प्रजा सब आये । राजासो उठि विनती लाए ॥ राय मता तुम है अवगाहा । हम सब जीव संग तुम आहा ॥ जो आयसु होवै महाराजा । सो हम करे मैटि कुल लाजा ॥
राजाका मोह वचन
सफल जन्म चाहो रे भाई । सद्गुरु शरण गहो लौलाई ॥ एक सुर्त हवौं दृढ नागर । गुरु रानिय हंसा होय आगर ॥ ऐसे गुरुसों विनती लाऊ । सकलो नय संग ले जाऊ ॥
छंद-सकल जीवन सुर्ति करके, राय चल हर्षित भये । जहाँ आप विराजे सुकृती, धाय पदपंकज नये ॥ जीव सब तुम शरण आये, आपने करि लीजिये । दया करि जिव बन्दि छोरे, अमर वासा दीजिये ॥
सोरठा-रानी सत्रह साथ, कुँवर पचास पद गहि लिये । सब जीवन नायेहु माथ, दरस दान प्रभु दीजिये ॥
( १९०४ )
बोधसागर
१४
चौपाई
साहेब चलो महल पग दीजै । हंसराज आपन कर लीजै ॥ दूजो चित कीजै जनि मोही । बारबार बिनवौं प्रभु तोही ॥ हम अजान कछु जानत नाही । तुम तो पुर रहे सबही माहीं ॥ कृपा करो मम बिथा विसारो । कालजाल जीवन निर्बारो ॥ चलि मंदिर पगु दीजे स्वामी । विनय करो सुनो अन्तर्यामी ॥ चले सुकृत महल पगु धारा । परजा रानी कुँवर भूआरा ॥ राजा रतनसिंहासन लाई । चरण बंदि सुकृताहि बैठाई ॥ सत्रह रानी आरति करहीं । बहुविध चितसों विनती धरहीं ॥ सकल जीव हैं शरण तुमारे । भवसागरते जीव उबारे ॥ हंसमती जेठी नृपराणी । साहेब चरण पखारे आनी ॥ हाथे चवँर कुँवर सब ढावत । एकहिटक सबे रूप निहारत ॥ ठाड़े राय जोर दौय पाना । साहेब कहो शब्द सहेदाना ॥ जेहि विध जीवसुक्त परभाऊ । सो साहेब मोहि भाषि सुनाऊ ॥
सुकृत वचन
छंद-वचन साहेब भाषे राजा, करहु आरति पावनं । चार गुरु किंकरहु साजी, कालकर्म नसावनं ॥ चित्र चै चित्र धोती, श्वेत वस्त्रहि लावनं । चित्र आरति साज राजा, करहु मंगल गावनं ॥ सोरठा-मेवा अष्ट प्रवान, चौका चंदन फेरहुं । दलझारी तहां आन, सवासेर महाँ चेतहुं ॥
चौपाई
तंदुल सवासेर ले आना । हार आरती कलश परवीना ॥ पुंगीफल अरु श्वेतहि पाना । चौकामहाँ धरो जो आना ॥ जिव पीछे नरियर कर लेहुं । जनियर सुकृत हाथ सो देहुं ॥
१५
गुरुमाहात्म्य
( १९०५ )
कञ्चन कलस पांच धरो वाती । ज्वलित कपूर धरो बहु भांती ॥ दल अमृतकी कञ्चन झारी । डार सुगन्ध धरो तेहि वारी ॥ खरचा सात मँगगवहु सेता । गासे सात वजन कर लेता ॥ आगरु साते ताहि प्रवाना । सो खरचा ले दल ये आना ॥ खरचा सात धरे दल जबही । धर्म देख थरहर भये तबही ॥ कनक पटम्बर कीन्ह सिंहासन । तापर साहेब कीन्हे आसन ॥ आनंद मंगल कीन्ह उचारी । राय धरा नरियर तेहि वारी ॥ युथ युथ जूरे जीव सब आए । नरियर धरे सुकृत मन भाए ॥ सत्रह रानी सुत सुत नारी । ते सब आय चरण चितधारी ॥ युग बंधे राजा अरु रानी । सोविधिसकलजीवमिलजानी ॥ भावरि देय प्रदक्षिण दीन्हा । हंस उबार अपनकर लीन्हा ॥
छंद-तब चरण मृदु मंजुल पावन अतिहि सुहावन भावन । अमि मूरतिसूरत धारत त्रिविध ताप नसावन ॥ आदि अनंत अनादि पुरुष करहु दया जाहिको । जीव जेहि तुम पकरि बहियां कालग्रस नहिं ताहिको ॥
सोरठा-तुम प्रभु शब्दस्वरूप, अमित भाव लखि ना तरे । तुच्छ बुद्धि मनरूप, जीवनपकरि नचावहुँ रे ॥
चौपाई
दीजे मोहि शब्द सहिदानी । तुमते नहीं बड़ो कहु दानी ॥ जेते जीव अमरघर जाई । होइ अमर भव बहुरि न आई ॥
सुकृतवचन
राजा रानी तृणहि तूरावा । त्रिगुण पदवितें जीव बचावा ॥ कुँवर पचास रायमत लीन्हा । हर्षित हाय सुमत इन कीन्हा ॥ प्रजा सकल नग्रनके आवा । सत्य सुकृतके दर्शन पावा ॥
( १९०६ )
बोधसागर
१६
बालक तिया बृद्ध सब आए । सो साहबके पद लपटाए ॥ पुरुष अंक दीन्हेउ मति आगर । पाय पान भये हंस उजागर ॥ स्मृतकहाथ दीन्ह जिव सबही । जाते यम नहिं रोके कबही ॥ पाय पान तब भए सनाथा । सकल जीव तब नाये माथा ॥
राजाका मोहवचन-छन्द
जिमि घन नभमें शशि अवलोकत सिद्ध होत उमंगही ॥ शब्द नभ गुरुचरण इमि निशि कर्म सूरत तरंगही ॥ तिमि हर्षे राजा सकल जिव मिला करत कोलाहल सोहही ॥ बृद्ध हंसन यूथ ठाढे निरखि सुकृतहि मोहहीं ॥ सोरठा-अब दीन्हा निज पान, अधम जीव अपने किये ॥ विनय एक अनुमान, देश आपने ले चली ॥
चौपाई
यह भवसागर अति अवगाहा । सुर नर देव पाए नहिं पाहा ॥ दर्शन आय दीन्ह तुम जाही । आपनकर राखे गहि ताही ॥ निशदिन यमहीफंद लगावत । शब्दहित्यागि विषयमन ध्यावत ॥ पलपल काल करत है घाता । शब्द तुम्हारा श्रुति नहिं राता ॥ ताते विनय करें बहुबारा । सकल जीव हैं शरण तुमारा ॥ एकहि सुरत सकल जिव केरा । अब जनि साहेब लावहु बेरा ॥ बेगि लै चलो वाही देशा । अमरपुरी जहाँ हंस नरेशा ॥ अबजनि मोहिराखहु भवसागर । ले चलो जहवां हंस उजागर ॥ दीनबधु प्रभु कीजे दाय। सकल हंस ले लोक सिधाय। ॥ भेटे चरण पुरुषके जाई । अब भव चिर नाही ठहराई ॥
सकल हंस वचन-छन्द
जीव चढ़ावें करत करूणा सुनहु नरपति नागरा । करहु सदगुरु विनय दृढ़ होय, नहिं रहब भवसागरा ॥
१७
गुरुभाहान्त्य
( १९०७ )
गुरु करे हिय दया त्यागे, मामा चिता व्याकुल अहे । अमर शोभा देख वे गुन, हर्ष जीवन अति अहे ॥
सोरठा-अब जिन लावहु बेर, ठाढ़े सकल अकुलावहीं । प्रभु दयावंत जो होइकै, वे पुरुष दर्श करावहीं ॥
राजाका मोहबचन-चौपाई
राजा रानी कुँवर पचासा । सकल जीव विनती परकाशा ॥ बेग लये चलो हंस पति राजा । वह विनती करे सकल समाजा ॥ चातक स्वाति रटत जिमि जैसे । तृषावंत सबरे जिव तैसे ॥
सुकृत वचन
सत्य सुकृतमें सुरति समानी । होय निशंक करो रजधानी ॥ पुरुष नाम राजाकहँ दीना । संग लोग हंसन सब लीन्हा ॥ राय मोह हम लोक चलि जाई । सत्तर सहस्र हंस सँग लाई ॥ ऐसे सुमति करो जो बंदा । कालत्रास नहीं हो दुखद्वंदा ॥ एकचित होय सुरति जेहि लाग। सत्य शब्द सो तन मन पागा ॥ देखि काल दूरहिते भागे । जो पदपुरुष नाम दृढ़ लागे ॥ राय गए जहाँ हंस समाजा । आए हंस आरती साजा ॥ गावहि मंगल करहि कुलाहल । षोडश शृंगारा अंग भल ॥
राजाका मोह वचन
राजा देखि चकित मन पागा । बार बार सुकृत पद लागा ॥ देखेउ लोक वरन अतिपावन । अब हमपाये निज मनभावन ॥
सुकृत वचन
सुकृतहि चले राय ले साथ। जाय पुरुष कहु नायउ माथा ॥ छंद-दर्श पाय नित जीव वे सब, रूप भयो परकाश हो । अमिय फल जब पाये हंसा, द्रीय द्रीय विलास हो ॥
( १९०८ )
बोधसागर
१८
सुवना सज्य शिर छत्र सोहे, बैठ हंस समाज हो ।
भए हरिपत राय रानी कीन लोक निवास हो ॥
सोरठा--इमि हंसन परसंग, युग बाधे सो हंस होय ।
लोक लाज तज रंग, ते पहुँचे अमरा पुरी ॥
इति श्रीगुरुमाहात्म्य ग्रंथ संपूर्ण