भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १८९६ )

बोधसागर

सतगुरुवचन

धर्मदास बूझे भल ज्ञाना । तुमसे कहौं सत्य चितमाना ॥ साहेब सम सतगुरु कहैं जानो । दुजी भावना चित्त न आनो ॥ जब गुरु मिले करे परनामा । छन छन पल पल आगे जामा ॥ गुरु चाहत जो शिष्य हे नागर । होय अधीन शीख्य मतिआगर ॥ शीष्य सुमिरि निशदिन अनुरागा । पानदेन वाइस मतभागा ॥ सद्गुरु शब्द गहे टकसारा । भवजल जीव उतारे पारा ॥ सद्गुरु कर्म देखि जिव केरा । तत्क्षण गुरु करहि निर्वेरा ॥ तिनुका तोरी देइ जिव याना । फिर नहिं जन्म धरे भवआना ॥ तुरते तब पावे टकसारा । होय हिरण्मय हंस हमारा ॥ वर्णभेद निर्णयकरि पावे । कालत्रास तेहि निकट न आवे ॥ प्रथमहि गुंजवरणको लेषा । सत्यशब्द गुरु कहै विशेषा ॥ गुंजवरण जो हंसा होई । गुरुलहि तेई हंस समोई ॥ गुंजवरण पावे परवाना । राय बंकेज हंस मगु जाना ॥ कर्म देखिकै तिरन तुरावे । राय बंकेजको पान जो पावे ॥ सारखी-देहि पान जेहि जीवको, कर्म कटा तेहि जान । हंस होय सत्यपुर चले, सद्गुरु वचन प्रमान ॥

चौपाई

वरण भेद पावही प्रवाना । सो हंसाकर लोक पयाना ॥ पावे दर्श पुरुषके जाई । रहे अटल पुनि छत्र तनाई ॥ करे अटल युग युगका राजू । जिन पाया निर्णयका साजू ॥ होय बहुरि स्थिर गर्भ न आवे । वरण भेद परवाना पावे ॥ सो गुरुकी पुनि आरति कीजे । चरण पखारि चरणरज भीजे ॥ सो रज हिय अरु शीश चढावे । कालप्रबल तेहि निकट न आवे ॥ ऐसे गुरु मुक्तिके मूला । तेहि पद सम दूजा नहिं वूला ॥