भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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गुरुमाहात्म्य

( १८९७ )

गुरुसाहेब जाने हड़ हीता । जेहि परताप काल जग जीता ॥ शिष्य जो करे गुरुसे चोरी । अजगर योनि होय तेहि केरी ॥ शिष्य जो गुरुसे अन्तर करई । जन्म जन्म चौरासी परई ॥ गुरु निंदा श्रवण सुने जबही । वेगिहि ठांव तजे पुनि तबही ॥ जेहि कानन सुमिरन सुनि लीन्हा । निंदा सुनि चह मूँदन कीन्हा ॥

साखी-गुरुनिंदा श्रवणन सुने, तत्क्षण छोड़े ठांव ।

जेहि कान गुरुस्तुति सुने, निन्दा निकट न ल्याव ॥

गुरुसे द्रोही शिष्य जो, संतन कीन्ह विरोध ।

सो चौरासी भर्म ही, भारे काल करि क्रोध ॥

चौपाई

गुरुकी आशीष नहीं मानी । करि अभिमान कालसम जानी ॥

गुरुहि छोट करे शीष समाई । सोई जन्म जन्म भरमाई ॥

शिष्य जो भोगे गुरुकी नारी । होइ अजगर बसै विपिन मँझारी ॥

तन छूटै धरि वृष अवतारा । लहि अनेक विधि पाप विकारा ॥

काया छूटै वृभषकी जहिया । स्वानजन्म पुनि पावे तहिया ॥

भूँकि भूँकि जग मरे गँवारा । विषय पाप पचवे संसारा ॥

झूकर जन्म होय पुनि ताही । सकल अपावन निशिदिन खाही ॥

निलज होय योनिनमें परई । लख चौरासी भ्रमता फिरई ॥

साखी-पाप विषय नहीं परिहरे, मरि मरि ले अवतार ।

कहैं कबीर धर्मदाससों, ऐसे कर्म अपार ॥

धर्मदास वचन-चौपाई

धर्मदास विनती अनुसारी । हे सदगुरु मैं तुम बलिहारी ॥

तेहि जीव किमि होय उबारा । फांसी डारे काल अपारा ॥

सो साहब कहिये मोहि साँचे । जैसे जीव कालसे बाँचे ॥

सदगुरु वचन

धर्मदास बूझेहु भल बाता । सो अब तोहि कहों विरुयाता ॥

नं. ११ बोधसागर - ५