कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1975, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें७
गुरुमाहात्म्य
( १८९७ )
गुरुसाहेब जाने हड़ हीता । जेहि परताप काल जग जीता ॥ शिष्य जो करे गुरुसे चोरी । अजगर योनि होय तेहि केरी ॥ शिष्य जो गुरुसे अन्तर करई । जन्म जन्म चौरासी परई ॥ गुरु निंदा श्रवण सुने जबही । वेगिहि ठांव तजे पुनि तबही ॥ जेहि कानन सुमिरन सुनि लीन्हा । निंदा सुनि चह मूँदन कीन्हा ॥
साखी-गुरुनिंदा श्रवणन सुने, तत्क्षण छोड़े ठांव ।
जेहि कान गुरुस्तुति सुने, निन्दा निकट न ल्याव ॥
गुरुसे द्रोही शिष्य जो, संतन कीन्ह विरोध ।
सो चौरासी भर्म ही, भारे काल करि क्रोध ॥
चौपाई
गुरुकी आशीष नहीं मानी । करि अभिमान कालसम जानी ॥
गुरुहि छोट करे शीष समाई । सोई जन्म जन्म भरमाई ॥
शिष्य जो भोगे गुरुकी नारी । होइ अजगर बसै विपिन मँझारी ॥
तन छूटै धरि वृष अवतारा । लहि अनेक विधि पाप विकारा ॥
काया छूटै वृभषकी जहिया । स्वानजन्म पुनि पावे तहिया ॥
भूँकि भूँकि जग मरे गँवारा । विषय पाप पचवे संसारा ॥
झूकर जन्म होय पुनि ताही । सकल अपावन निशिदिन खाही ॥
निलज होय योनिनमें परई । लख चौरासी भ्रमता फिरई ॥
साखी-पाप विषय नहीं परिहरे, मरि मरि ले अवतार ।
कहैं कबीर धर्मदाससों, ऐसे कर्म अपार ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास विनती अनुसारी । हे सदगुरु मैं तुम बलिहारी ॥
तेहि जीव किमि होय उबारा । फांसी डारे काल अपारा ॥
सो साहब कहिये मोहि साँचे । जैसे जीव कालसे बाँचे ॥
सदगुरु वचन
धर्मदास बूझेहु भल बाता । सो अब तोहि कहों विरुयाता ॥
नं. ११ बोधसागर - ५