कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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कबीर चरित्रबोध
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कर रहा था और कबीर साहब काशीसे चलकर मग्नहदेश को जा पहुँचे । आमी नदीके किनारेपर किसी साधुकी कुटी थी इस कुटीमें जाकर वह बैठ गये । और इस समय राजा वीरसिंह और नौवाब बिजलीखाँ और कबीर साहबके बहुत सेवक और शिष्य थे । वह नदी जिसके किनारेपर कबीर साहब आकर बैठ गए थे, वह अनेक दिवसों शुष्क पड़ी थी तब कबीर साहबने गुप्त रीतिसे कमलपुष्प तथा दो चादरें मँगाई और आप लेट गये और लोगोंसे कहा कि, अब ताला बंद कर दो । तब राजा वीरसिंहने कहा कि, गुरुजी मैं आपके शवको लेकर हिन्दू धर्मानुसार किया कर्म इत्यादि करूँगा । तब नौवाब बिजलीखाँ बोले कि, मैं आपको ऐसा कदापि करने नहीं दूँगा, मैं मुसलमानधर्मानुसार उनकी कफन दफन करूँगा, तब कबीर साहबने देखा कि, ये दोनों युद्धके निमित्त प्रस्तुत हैं, इसमें व्यर्थका रक्तपात होगा और दोनोंको युद्धके निमित्त प्रस्तुत-दोनोंको दलबल सहित-प्रस्तुत पाया । तब आपने दोनोंसे समझाकर कहा कि, सावधान दोनों आपसमें विवाद न करना और कदापि शस्त्र मत चलाना जो मेरी बात मानेगा सो प्रसन्न रहेगा, और सत्यगुरुकी आज्ञाको दोनों दलने स्वीकार कर लिया । तब सबोंने सत्यगुरुको दंडवत् प्रणाम किया और सबका चित्त खेदसे भर गया तब कबीर साहबने चलानेका शब्द पढ़ा और चादर तानकर लेट गये अपने सुंहपर कपड़ा ले लिया और लोगोंसे कहा कि, अब इस कोठरीका ताला बन्द कर दो लोगोंने वैसाही किया । जब ताला बन्द किया तब एक ऐसा शब्द हुआ कि, जिसको सुनकर उपस्थित मनुष्योंके चित्तपर बड़ा प्रभाव पड़ा और जयजयकार हुआ कि, सत्यगुरु सत्यलोकको सिधार गये ।