कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1922, कुल 2136 में से
संदर्भ में पढ़ें( १८४४ )
बोधसागर
६०
बारम्बार जन्म और मृत्युका दुःख दूर हो वही मनुष्यका धर्म है। और उसी गुरु तथा शास्त्रको धारण करना मानुषिक बुद्धिका कर्तव्य है। जो कोई मनुष्य देह पाकर मुक्तिमार्ग न ढूँढे वह महा अभाग है। कारण यह कि, वह पुनः ऐसा समय न पावेगा और सदैव भवसागरमें डुबकियाँ खावेगा। योगमुक्ति तथा समस्त तंत्र मंत्र बंधनके प्रधान कारण हैं। यदि योग समाधिसे योगी अमर होता तो फिर कदापि कोई योगी न मरता। संन्यासी जो ब्रह्मके ध्यानमें रहते हैं सो ब्रह्म उनका भ्रम है सो संन्यासी भ्रमरूप होकर आवागमनमें पड़ा रहता है, सो ब्रह्म उनका भ्रम होकर भ्रममें फँसे रखते हैं। ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादिक इत्यादि सब भ्रम नदीमें पड़े डुबकियाँ खारहे हैं इस भ्रमकी कोई सीमा नहीं है।
स्वयम् वेदके विना पढ़े किसीकी मुक्ति नहीं होती जो कोई ध्यानपूर्वक पढ़े और उसके विषयोंपर विचार करे और स्वसम्वेदकी आज्ञाओंपर भली भाँति दृढ़ हो और समस्त मिथ्या ओंसे पृथक् हो सो मनुष्य है और वही कालपुरुषके पक्षेसे छुटकारा पावेगा। कंजूस, व्यभिचारी पुरुषको स्वसम्वेद पढ़नेसे किसी प्रकारका लाभ नहीं है।
अपने गुरुके स्वयम् सत्य पुरुष करके जानना और गुरुके मुँहसे स्वयम् सत्यपुरुष खाता पीता है और गुरुके शरीरसे वस्त्रादि पहनता है जिसको गुरुकी बातपर विश्वास न होवे और जिसके मनमें घमंड हो तथा जिसके मनमें नव्रता न हो तो वह नरकमें जावेगा। सेवा सब पुण्योंसे बढ़ा चढ़ा पुण्य है। सेवाका कर्तव्य सबके ऊपर है जो गुरुकी सेवाका कर्तव्य पूर्ण करेगा उसका हृदय प्रकाशित होगा और उस गुरुकी ही