भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर चरित्रबोध

(१८४५)

मूर्तिसे पारख गुरु निकलकर उसकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करेगा और कोई अपने गुरुके प्रतिका कर्तव्य न पालन करे और उससे अपने प्रतिका कर्तव्य पालन करावे और उसकी दी हुई वस्तुओंको मांगे तो वह चोर और ठग है। एक अवस्थामें गुरुकी सेवा न मांगी जावेगी जब कि, मनुष्य भली भांति डुबा रहे और दिनरात वंदनामें संलग्न हो जावे और किसी अन्य ओर ध्यान न हो और अपने शरीरकी चिता भी न हो तब गुरुसेवा क्षमा होगी और गुरु उसकी वंदनाका भागी होगा। जबलें ऐसी अवस्था न हो तबलें गुरुसेवासे यदि अपनेको न बचायेगा तो उसके मनमें तेज न चमकेगा, इस कारण समस्त जीवन गुरुकी सेवा तथा उसकी आज्ञामें रहना उचित है। कारण यह कि, गुरुके प्रतिका कर्तव्य कभी किसीसे पूर्णरितिसे निबह नहीं सकता। केवल एक नामके प्रतिफलमें तीनों लोकोंमें कोई वस्तु नहीं हैं जो दी जावे। गुरु ही धर्मकी जड़ है और जड़के सींचनेसे डाल पात सब हरे होते हैं और निश्चयके वृक्षमें सब फल फूल लगते हैं।

कंजूसकी मुक्ति कभी नहीं होती यह कंजूस बहुत बड़ा शैतान है यह जिसके मनमें प्रवेशित होता है वह जीवित श्मशानीभूत है। यह एक घृणा उत्पादक लत है और इससे स्वयम् परमेश्वरको घृणा होती है और समस्त पीर पैगम्बर तथा सिद्ध साधु इसको बुरा जानते हैं। किसी प्रकारकी वंदना तथा सेवा मनुष्य करे परन्तु एक कृपणता ऐसी वस्तु है जिससे वह सब विनाश हो जाती है। और कंजूससिद्धकी समस्त सिद्धि धूलमें मिल जाती है।