कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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बँधवा दिया । जब जहाँगस्तने दूरसे कबीर साहबकी कुटीको देखा और द्वारपर सूवर बँधा हुआ पाया तब बड़े कुद्ध हुए और झल्काकर पलट पड़े । तब कबीर साहबने पुकारा कि, ऐ जहाँगस्त ! क्यों पलटे जाते हो ? मेरे समीप आओ । इतनी बात सुनकर जहाँगस्तने मालूम कर लिया कि, कबीर साहबने जान लिया और मुझको पहचान लिया । तब उनके मनमें निश्चय हो गया कि, कबीर साहब कोई सिद्ध पुरुष हैं । वहाँ से पलटे और कबीर साहबके पास आकर कहने लगे कि, मैंने सुना था कि, कबीर साहब बड़े सिद्ध हैं इस कारण मैं आपसे भेंटके निमित्त आया था । आपने द्वारपर हराम बाँध रक्खा है, यह कैसी बात है ? यह बात सुनकर कबीर साहब ने उत्तर दिया कि, ऐ जहाँगस्तशाह ! मैंने तो हरामको अपने घरके बाहर बाँधा है आपने हारामको अपने भीतर बाँध रक्खा है । फिर बाहर निकाल देना अच्छा कि, भीतर बाँध रखना अच्छा । कारण यह कि, कोध अहंकार मद आदि सब हराम हैं सो तुम्हारे भीतर हैं । जिसको तुमने हराम समझा है वह हराम नहीं बरन् कोध हराम है । इस शिक्षासे जहाँगस्तशाह प्रसन्न हो गये संध्याका समय निकट आया तब जहाँगस्तशाहने इच्छा प्रकट की कि, मैं मक्कामें निमाज पढ़ा चाहता हूँ । कबीर साहबने एक पलमें मक्कामें प्रवेशित करा दिया । यहाँ फिर सिद्धोंके बीच जहाँगस्तसे जाया न जावे तब कबीर साहबने उनको वहाँ भी पहुँचाया, तब जहाँगस्त अधीन हुए ।
रामदासको विष्णुदर्शन
रामदास नामक धनाढ्य एक ब्राह्मण जागीरदार था । वह दक्षिण देश नर्मदा नदीके किनारेपर रहता था । एकबार कबीर साहब