भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर चरित्रबोध

( १८३७ )

परास्त हुए । जब इस प्रकार तीन बेर हुआ तब सर्वानन्दको निश्चय हो गया कि, निस्सन्देह कबीर साहब ईश्वर है और चरणों-पर आन पड़े और शिष्य हो गए । कबीर साहब तथा सर्वानन्दका विवरण भिन्न भिन्न स्थानोंमें लिखा है ।

चौरासी सिद्धोंका परास्त होना

एक स्थानपर नव नाथ चौरासी सिद्ध कबीर साहब तथा नानक साहब सहित एकत्रित थे । उस समय एक महाजन जो नानक साहबका परिचयी अथवा सेवक था जा पहुँचा, तब उसने विचारा कि, सन्त गुरुके समीप विना कुछ लिए जाना उचित नहीं कुछ भेंटके निमित्त ले चलना उचित है । तब उसने अपनी जेबमें हाथ मारा पर कुछ न पाया, परन्तु एक तिल उसके वस्त्रोंमें मिला । तब उसने उसी तिलको नानक शाहके समक्ष रक्खा-तब नानक शाहने कबीर साहबसे कहा कि, मैं इस तिलको इतने साधुओंमें किस प्रकार बाँटूँ-तब कबीर साहबने कहा कि, इस तिलको जलमें घोटकर सकल साधुओंमें बाँटो तब नानक शाहने कहा कि, यहां तो जल भी नहीं है, किस प्रकार घोटे । यह बल आप ही में है इसको बाँटिये । तब उस स्थानपर एक शुष्क नदी थी, उसको कबीर साहबने जारी ! किया और उसमेंसे जल भरकर उस तिलको घोटा और सब साधुओंको पिलाया और उसके पीनेसे अत्यन्त आनंद आया और उन्होंने कहा कि, कबीरजी मांगो जो मांगो सो हम लोग आपको देंगे । तब कबीर साहबने कहा कि, तुम लोग तो दरिद्री जान पड़ते हो मैं तुमसे क्या मांगू और तुम मुझको क्या देंगे ? तब उन लोगोंने कहा कि जो कुछ तुम मांगोगे सो हम तुमको देंगे । तब कबीर साहबने कहा पाँच पैसेभर दरिद्रता