भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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कबीर चरित्रबोध

( १८३५ )

ग्रन्थोंमें लिखा है कि, जब मुक्तामणि साहबका समय आवेगा और उनका झण्डा दिल्ली नगरीमें गड़ेगा तब वे समस्त पुस्तकें पृथ्वीसे बहिर्गत होंगी । सो मुक्तामणि साहबका अवतार वंशकी तेरहवीं पीढ़ीमें होगा । तब वंशगुरुगद्दी दिल्लीमें स्थिर होगी ।

सर्वानन्दका वृत्तान्त

सर्वानन्द ब्राह्मण भारतवर्षके समस्त नगरोंमें जाकर और पंडितोंके साथ शास्त्रार्थ करके विजयी हुआ था । कोई पंडित जब उसके सामने न ठहरा तब वह अपने घर आया और अपनी मातासे कहा कि, हे मातः ! अब तुम मेरा नाम सर्वजित् रक्खो और मेरे माथे पर विजय तिलक कर दो । क्योंकि, अब मेरा सामना करनेको कोई पंडित नहीं रहा । तब माताने कहा कि, ऐ पुत्र ! तूने काशीमें जाकर कबीर साहबके साथ भी वाद-विवाद और सामना किया था ? तब उसने कहा कि, नहीं । तब माताने कहा कि, जबलों तू कबीर साहबपर विजयी न होगा तबलों तेरा नाम सर्वजित् नहीं रक्खूँगी । तब सर्वानन्दने कहा कि, कबीर कैसा बड़ा पंडित है । मैं अब चलकर उसके साथ वाद विवाद करता हूँ । और बहुतसे ग्रन्थ और वेद इत्यादि लादकर काशीमें कबीर साहबके पास पहुँचे । कबीर साहबने कितनी लीलाएँ दिखलाईं तो भी सर्वानन्दको निश्चय नहीं हुआ । अन्तमें सर्वानन्द कबीर साहबके साथ वाद विवाद करने पर उद्यत हुए । सर्वानन्दने श्लोकोंकी झड़ी लगा दी; यद्यपि कबीर साहब समझाते पर वह न मानते । बात बात पर श्लोक, प्रमाण, तथा पुस्तकोंकी साक्षी देते । तब कबीर साहबने देखा कि, इसके पीछे तो घमंडका भयानक रोग लगा है, यह