कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९५९ )
धर्म महम्मदमें बतलाये । निश्चय तरुपर गुरु बैठाये ॥ निश्चय माह गुरुका बासा । बिन गुरु निर्गुण नर्कनिवासा ॥ निश्चयमें जब सदगुरु बैठे । जिवके हृदय ज्ञान तब पैठे ॥ जिनके हृदये निश्चय नाहीं । तो सबही निगरे नर आही ॥ द्रन्द्वते भया सकल संसारा । द्रन्द्वहि तासु छोड़ावन हारा ॥ पुरुष नारिको भया जो मेला । ताते जगको पसरा सेला ॥ तैसे जब गुरु शिष्य मिलजाई । सकल भर्म भय जाय नसाई ॥ बिन गुरु जीव राह नहीं पावै । जप तप दान बुथा सब जावै ॥ गुरुके बचन चरन चित दीजै । कबहू ताहि उलंघ न कीजै ॥ करिये गुरुकी सदा बड़ाई । गुरुअस्तुति सब अघ बिनसाई ॥ निशदिन ताहि सेवामें रहिये । ताते अधिक न तप कोह कहिये ॥ तन मग धन गुरु अर्पन करना । गोखुरसो भवसागर तरना ॥ गुरु निरुद्ध करिये जो कर्मा । होय शुद्धपै तजे अधर्मा ॥
सत्यकबीर बचन
साखी-कबीर गुरुबिन माला फेरत, गुरुबिन देते दान । गुरु बिन दाम हराम है, पूछो वेद पुरान ॥ गर्भयोगेश्वर गुरु बिना, लागा हरिकी सेव । कहै कबीर बैकुण्ठते, फेरि दियो शुक्रदेव ॥ कबीर गुरुबिन भर्मा, यौ फिरे ज्यों रामकोरोझ । सतगुरुसे परचै भई, पाया हरिको खोज ॥ कबीर जो निगुरा सुमिरन करे, दिनमें सौ सौ बार । नगर नायक सत करे, तौ जरे कौनके लार ॥ गुरु आज्ञा निरखत रहै, जैसे मणिहि भुअंग । कहै कबीर संसारमें, यह गुरु मुखको अंग ॥ गुरुकी आज्ञा आवई, गुरुकी आज्ञा जाय ।