भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९६० )

बोधसागर

५२

कह कबीर सो सन्त है, आवागौ न नशाय ॥ कबीरगुरु मानुषकरि जानते, चरणामृतको पान । ते नर नरकहि जायँगे, जन्म जन्म हो श्वान ॥ कबीरते नर अन्ध हैं, गुरुको कहते और । हरि रूठे तो ठौर हैं, गुरु रूठे नहिं ठौर ॥ कबीर गुरु है बड़े गोविन्दते, मनमें देख बिचार । हरि सुमिरे सो बार है, गुरु सुमिरे सो पार ॥ कबीर गुरुसे ज्ञान जो लीजिये, शीश दीजिये दान । केतिक भाँड़ पचिसुये, राखि जीव अभिमान ॥ कबीर तीन लोक नौरखंडमें, गुरुते बड़ा न कोय । करता करे न करि सकै, गुरु करे सो होय ॥

चौपाई

गुरुके लक्षण चार बखाना । प्रथमहि वेद शास्त्रको ज्ञाना ॥ पुनि हरि भक्त मनो क्रम बानी । तृतीये समदृष्टी कहि गानी ॥ चौथे वेदकी विधि सब कर्मा । यह चौ गुरुगुन जानो मर्मा ॥ मुख्य एक गुन गुरु कहि दीजै । चेलेको हरि सन्मुख कीजै ॥ गुरुको अर्थ अज्ञ तिमिराना । रू जाते प्रकटे हिय ज्ञाना ॥ दूर करे जो अज्ञ अघेरा । गुरु नाम ताही को टेरा ॥ ऐसहि शिष्य धर्म चौ भनते । गुरुकी सेवा तन मन धनते ॥ दुतिये सेव मैं विषयको त्यागे । तृतीये मन हंकार न जागे ॥ चौथे गुरुके वचन प्रतीती । जो कोइ गहै चलै यम जीती ॥ शिष्यको दोय धर्म सर्वोपर । गुरु सेवा वाती निश्चयकर ॥ जामें दोय धर्म ये बसि हैं । गुरु असीबते सब गुन लसिहैं ॥ आठ गुरु जो कीन प्रमाना । सबहि श्रेष्ठ अति उत्तम जाना ॥ सर्वोपरि दीक्षा गुरु भाषी । जाते भक्ति मुक्ति पद राखी ॥