कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( १९६० )
बोधसागर
५२
कह कबीर सो सन्त है, आवागौ न नशाय ॥ कबीरगुरु मानुषकरि जानते, चरणामृतको पान । ते नर नरकहि जायँगे, जन्म जन्म हो श्वान ॥ कबीरते नर अन्ध हैं, गुरुको कहते और । हरि रूठे तो ठौर हैं, गुरु रूठे नहिं ठौर ॥ कबीर गुरु है बड़े गोविन्दते, मनमें देख बिचार । हरि सुमिरे सो बार है, गुरु सुमिरे सो पार ॥ कबीर गुरुसे ज्ञान जो लीजिये, शीश दीजिये दान । केतिक भाँड़ पचिसुये, राखि जीव अभिमान ॥ कबीर तीन लोक नौरखंडमें, गुरुते बड़ा न कोय । करता करे न करि सकै, गुरु करे सो होय ॥
चौपाई
गुरुके लक्षण चार बखाना । प्रथमहि वेद शास्त्रको ज्ञाना ॥ पुनि हरि भक्त मनो क्रम बानी । तृतीये समदृष्टी कहि गानी ॥ चौथे वेदकी विधि सब कर्मा । यह चौ गुरुगुन जानो मर्मा ॥ मुख्य एक गुन गुरु कहि दीजै । चेलेको हरि सन्मुख कीजै ॥ गुरुको अर्थ अज्ञ तिमिराना । रू जाते प्रकटे हिय ज्ञाना ॥ दूर करे जो अज्ञ अघेरा । गुरु नाम ताही को टेरा ॥ ऐसहि शिष्य धर्म चौ भनते । गुरुकी सेवा तन मन धनते ॥ दुतिये सेव मैं विषयको त्यागे । तृतीये मन हंकार न जागे ॥ चौथे गुरुके वचन प्रतीती । जो कोइ गहै चलै यम जीती ॥ शिष्यको दोय धर्म सर्वोपर । गुरु सेवा वाती निश्चयकर ॥ जामें दोय धर्म ये बसि हैं । गुरु असीबते सब गुन लसिहैं ॥ आठ गुरु जो कीन प्रमाना । सबहि श्रेष्ठ अति उत्तम जाना ॥ सर्वोपरि दीक्षा गुरु भाषी । जाते भक्ति मुक्ति पद राखी ॥
५३
जीवधर्मबोध
( १९६१ )
गुरु गोविंद दोउ एक स्वरूपा । बिलु गुरु परा जीव भ्रमरूपा ॥ बिन गुरु कोई विद्या नहिं आवै । अलख अभेद सो कैसे पावै ॥ बिना निशाने तीर चलावै । अंध समान ठौर नहिं पावै ॥ अच्छे गुरुके दूँढन मांही । निगुरा रहन भलो कछु नाहीं॥ जो कोई कर्म धर्म बतलाये । सो गुरु करि लीजे मन भाये ॥ बहुरि जहां उत्तम गुरु पिये । ताके चरननमें चित लैये ॥ जो दृढ हो सांचा गुरु दूँढा । निश्चय लहै गहै पद गूँढा ॥ गुरु बिन अज्ञ रहै नर कैसे । मानुष ज्यों पशु देखी जैसे ॥ जो मानुष हो गुरु बीहीना । सो जड़ पशु पंछी ते दीना ॥ पशु पंछी जेते जगमांही । बिन गुरु सबही ज्ञान गहाही ॥ निज पितु मातु ढंग सब धरही । बिना सिपाये सब कछु करही ॥ बिनगुरु करहि कर्म विधि नाना । नरके कबहुँ आव न ध्याना ॥ नर सब जिवते अबला बहूता । गुरुद्वारे पावै बल बूता ॥ शिष येते पशुहू सिपि जाहीं । मनुष सो ज्ञान होय तेहि नाहीं॥ गुरु द्वारे नर सो गुन पावै । नरते सो ईश्वर है जावै ॥ यहि विधि नर है गुर आधीना । करिये कर्म कर्म हो छीना ॥ कर्म कीजिये सतगुरुसङ्ग । तब उर उपजै ज्ञान अभंगा ॥
दोहा-गुरुव्रानी रविकर निकर, कर उर शिष्य प्रकाश । ज्ञानदीपके जगमगे, भयौ धर्मको नाश ॥
चौपाई
सर्वोपरि गुरुकेर महातम । बिनगुरुकोलखि पावै आतम॥ गुरुकी सेवा गुरुकी पूजा । गुरुसमान कोइ देव न दूजा ॥ गुरुके चरनन जिन चित दीन्हा । आतमपरमातम तिन चीन्हा॥ गुरुकी कृपा हनै सब शोका । सोई सुखदायक दोहु लोका ॥ रामकृष्ण गुरुके गुन गायौ । ताके चरननमें चित लायौ ॥
नं. ११ बोधसागर - ७
( १९६२ )
बोधसागर
५४
संत कबीर गद्गौ गुरु चरना । बारबार ताको जस वरना ॥ गुरु करिके जो दांष लगावै । सूकर श्वान केर तन पावै ॥ नारद गुरुको दोष लगायौ । चौरासी ताको भरमायौ ॥ पूरव कथा यह कागभसुंडर । उठिकेन्हिप्रनाम गुरुकोकर ॥ नाथ करत शिवमंदिर मांही । गुरु तासुचलिआयौ ताही ॥ गुरुको देखि न सो सनमाना । निरखि अर्नात शंभुरिसियाना ॥ भै अकाशबानी तेहि काला । रे खल तैं गुरुधर्म न पाला ॥ धरु जड़ माहस सर्प शरीरा । गुरु अपमान पाव बहुपीरा ॥ एक बार पथकी यह बाता । बद्रिकाश्रममहिमें चलिजाता ॥ जाता दीख महि पंथ दुहेला । एक गुरु ताको एक चेला ॥ परम प्राति निजु गुरुसे धरई । चरनामृत बिन भोग न करई ॥ लागे तहां पहारको पानी । खेदते दुःखित गुरु कह जानी ॥ गुरुकी सेव शिष्य सो त्यागा । गारी देना ताहिको लागा ॥ गुरुहि दुखी तजिके चलि गेऊ । बद्रिपतिकी मारग लियऊ ॥ तहैंते पलटिके सो जब आई । कुष्ठवरन ताके तन छाई ॥ बाटहि माह कुष्ठ भरि मारा । यह चरित्र निज नैन निहारा ॥ गुरु निरादरको जिमि पापा । तिमि सेवाफल अगिनित थापा ॥ कॉटिन जप तप करे जो कोई । गुरुविहीन सब निरफल होई ॥ मुनि सुकदेवसे को बड़ि ज्ञानी । गर्भते योगमुक्ति जिन ठानी ॥ तपबल सो वैकुण्ठ सिधाया । बिन गुरु तहां रहन नहि पाया ॥ गुरुकी निंदा करे जो प्रानी । घोर नरकमें वासा ठानी ॥ गुरुते ईर्षा जो जड़ करिहै । सो यमदंड भांति बहु भरि है ॥ गुरुकह बड़ गोविंदते कीन्हा । जाकी कृपा गोविंदहि चीन्हा ॥ गुरुसम और न दूजा दाता । सबको मन वेदन विरुथाता ॥ रिद्धि सिद्धि गति मुक्ति अमाया । बिन गुरु दया न कहुँ कछु पाया ॥
५५
जीवधर्मबोध
( १९६३ )
गुरुविन कहो गाँठि को खोले । गुरुविन अंध टटोलत डोले ॥ बारबार कर गुरु गुण गाना । कहा कौन गुरुदेव समाना ॥ धन्य धन्य गुरु देव गोसाईं । तान्यौ भव गोखुरकी नाईं ॥ गुरुगुरु जपिके जागे योगी । विरति विचार प्रपंच वियोगी ॥ जादिनते गुरु शरनमें आये । तादिनते दुःख दोष दुराये ॥ गुरुकी पारन सकल सुखदाईं । गुरुप्रमाद अमरावति पाईं ॥ जौ गुरु जीवहि नाम न देता । तौ कहु कौन मुक्तिपद चेता ॥ ताते गुरु सब सुखको कारन । तासु चरनरजकर शिर धारन ॥ धन्य धन्य सो शिष्य बड़भागी । तन मन धन गुरुसेवा लागी ॥ तीरथ व्रत कछु काज न नाहीं । गुरुके चरणनमें पति जाही ॥ गुरुसमान तीरथ नहीं औरा । गुरु महात्मविदित सब ठौरा ॥ कोटिन तीर्थ गुरुजीके चरना । संत कबीर जो निजुमुख वरना ॥ गुरुको शीव न मानै जोईं । सो जिव निश्चय जाय बिगोईं ॥ गुरुसे लगन जासुकी लागे । तन मन धन तनसम सो त्यागे ॥ अब सुनिये गुरुपारख पदको । सोई परम गुरु है बेहदको ॥ हदके गुरुको जिन भल पूजा । ताहि मिले पारख गुरु दूजा ॥ हद बेहद माह गुरु सोईं । बिना ज्ञान लखि परत है दोईं ॥
सत्यकबीर बचन-चौपाई
गुरुसम दाता कोइ न भाई । मुक्तिको मारग दियौ बताई ॥ गुरुविन हदये ज्ञान न आवै । ज्यों कस्तूरी मृगा भुलावै ॥ गुरुविन मिटै न अपनो आपा । धर्मजबड़ी बांधा शापा ॥ गुरुविन केहरि रूपमें पड़िया । गुरु विन गजछायासे लड़िया ॥ गुरुविन श्रान देखि बहु भेषा । मन्दिर एक काँचकी देखा ॥ चहुँदिश दीस आपनी छाया । भूकत भूकत प्रान गँवाया ॥
( १९६४ )
बोधसागर
५६
गुरुबिन सुवा नलनिसे बंधा । गुरुबिना कपि पड़ौ जो फंदा ॥ कहे कबीर भर्म संसारा । बिन सदगुरु को उतरे पारा ॥ सार्वी-भर्म जेवड़ी जगबंधा, फिर जन्मै मरिजाय । कहैं कबीर सतगुरु मिलै, तब सतलोकसिधाय ॥ मीन चकार मगल मधु, पशु है तजै न नेह । नर है तजै कबीर जो, तिनके मुँह दे खेह ॥
शब्द
नरको नहिं परतीत हमारी । झूठी बनिज कियौ झूठे संग पूजी सबै मिलिहारी ॥ शब्दरशन मिलि पंथ चलायौ तिरदेवा अधिकारी ॥ राजा नय बड़ो परपंची रैअत रहत उजाड़ी ॥ इतने उत उतते इत राखत यमकी साट सँवारी ॥ ज्यों कपि डोरि बांधी बाजीगर अपनी खूशी रारी ॥ इहै पेड उतपति पल्यको विषया सबै बिकारी । जैसे श्वान अपावन राजित त्यों लागी संसारी ॥ कहैं कबीर यह अद्भुत ज्ञाना को मानै बात हमारी ॥ अजहुँ लेव छोडाय कालसे जौकै सुरति सँभारी ॥ दोहा-गुरुकी महिमा अधिक है, थके विष्णु विधि वाम ॥ जोरि युगलकर पायपरि, कोटि कोटि परनाम ॥
इति नर शरीर गुरुआधीन
अथ शरनागतीको वर्णन-चौपाई
सतगुरु शरण सकल सुखदाई । ताते जिव सत लोक समाई ॥ साचे गुरुकी गहिये शरना । सोई जीव दुसह दुःख हरना ॥ झूठे गुरुसे काज न सरिहै । धोखे जिव यमके सुख परिहै ॥ सूर कि शरण परे जो कोई । सो जिव कबहुँ न जाय बिगोई ॥
५७
जीवधर्मबोध
( १९६५ )
कायर क्रूरकी शरणमें लागे । अंतमें छोड़िके ताको भागे ॥ श्वान पूछि गहि जाय न पारा । बूड़ि मरे भवसागर धारा ॥ अंधको राह देखाव कि अंधा । बंधेको खोले कह बंधा ॥ केत उपासक भाषे सोई । भक्ती अरु शरणागत दोई ॥ उभय भांतिसे प्रभुपद पाये । तामें ऐसो भेद बताये ॥ भक्ती ग्राहक ऐसे कहई । युक्ति जतन करि हरिपद गहई ॥ एकजन्म नहिं जन्म अनेका । छूटें नहीं भक्तिको टेका ॥ काहू जन्म मिले हरि अपना । छूटै सकलभय भर्म कलपना ॥ पुनि कह शरनागत जो ग्राही । करनकरावन मोहि कछु नाहीं ॥ शरन हो आपको हरि अर्पनकर । बहुरि नहीं कछु युक्ति यतनकर ॥ शरण हो फेर यतन जौं गहिये । तो शरणागत मिथ्या कहिये ॥ शरन हैं जौं निश्चयमें घाटा । ताकी यमगन रोकै बाटा ॥ जो सतगुरुकी शरणको ताकी । तेहि कछु यतन रहै नहिं बाकी ॥ ताते शरणागत सब परहै । शरण गहै ते जीव उबरहै ॥ शरणागत कह सब गुण आवै । ज्ञानभक्ति तेहिमाह समावै ॥ शरण हो जब यह निश्चय आई । प्रभु मोहि दोनों लोक सहाई ॥ सकल पाप ताको जरि जावै । जो सतगुरुकी शरणमें आवै ॥ शरणागतहो षट्गुन गहिये । ऐमे ताको व्यौरा कहिये ॥ विधि निषेध निजगुरुकी टेवा । दुतिये साधु प्रीत अरु सेवा ॥ तृतिये यह निश्चय उरधारै । मो अधबिसरि नाथ मोहितारै ॥ चौथे यह निश्चय मन माहीं । प्रभु तजि मोर सहायक नाहीं ॥ कैसेहु दुःख सांकरे गूढा । प्रभुतजि और सहाय न दूढा ॥ पञ्चम सतगुरु मूर्तिको ध्याना । ताके सन्मुख बिनती ठाना ॥ प्रभु तजि मोर ठेकाना नाहीं । पावन पतित नाम प्रभु आहीं ॥ मो सम पतित न कतहु निहारा । प्रभु सम और न तारनहारस ॥
( १९६६ )
बोधसागर
५८
छटयें आपको प्रभुहिं समपैं । ताको कबहुँ काल नहिं दपैं ॥ यह षट्गुन जो कोई धारा । शरणागत पलमें कर पारा ॥ काहू साधनको नहिं काजा । शरणागती सकल सुखसाजा ॥ कोइ कोइ आचारज हैं ऐसे । शरणागत विधि भापे जैसे ॥ निशदिन प्रभुको ध्यान लगावैं । यक क्षण भरि बिसरै नहिं पावैं ॥ टुटै न तार भजन दिन राती । शरणागत कहिये यहि भांती ॥
सत्यकबीर बचन
साखी-कबीर जो जाकी शरन गहै, ताको ताकी लाज । उलटि मीन जल चढ़त है, बह्यो जात गजराज ॥
चौपाई
जल अरु मीन कि प्रीति निहारो । तजे प्रान हो जलते न्यारो ॥ ऐसे सतगुरु पद रति राते । निशदिन तासु ध्यानमें माते ॥
कुण्डलिया
रामानन्द कि फौजमें, कबीरके शिरमौर । लूला लँगड़ा पांगुला, सबको करि गये ठौर ॥ सबको करि गये ठौर, सुनो कलिके नर नारी । गहिये ताकी शरण, हरण भवकी भय भारी ॥ भय भारी हटजाय, उपाय न कलिमें दूजी । मेटे यमकी त्रास, आस ताहीते पूजी ॥ शरणगहे सुख होय जिव, बीते सकल कलेश । गह्यौ बिभीषण शरण हरि, कीन्हा लंक नरेश ॥ कीन्हों लंकनरेश देशपति, प्रथम सो रहेऊ । शरण कबीर सराहि, जाहि खल दल बहु तरेऊ ॥ तन्यौ थपच चंडाल, डाल अघरहेऊ नकनिका । परमपुरुष पद पाय, यथा काशी की गणिका ॥
५९
जीवधर्मबोध
( १९६७ )
शरणागतको धर्म यह तन मन करिये भेट । गुप्त प्रकट सब आपिये पुनि यम गहे न फेट ॥ फेट गहे तब कौन सकल तेरौ नहिं मेरो । बाहर भीतर पौर ठौर सब तेरौ डेरो ॥ तेरौ डेरो भयो वस्तु तामें सब तेरी । तूही तहैं रखवाल छुटी सब संशय मेरी ॥
चौपाई
अब कलिमें आयू नर थोरी । को चित योग युक्तिमें जोरी ॥ पुण्यदान कह ध्यान अगाधू । कर्मविहीन गृही अरु साधू ॥ ताते शरनागत सुखदाई । और यतन कलिमें नहिं पाई ॥ कलिके जीव अनन्त अपारा । शरण कबीर होय भवपारा ॥ मूर्ख पुरोहित जस बिन ज्ञाना । ताको दान देत यजमाना ॥ दृढ़ है सतगुरु शरण गहीजै । सकल भर्मभय ताते छीजै ॥
सत्यकबीर बचन-शब्द
बिरिजमें महारि न खेले सिकार । चारपांच दश बीश महाभट संग लीने तीनो भरतार । मीनरूप है रहै जगतमें डारि बहावै तिरगुन जार ॥ जलरूपी है रहै संत कोई गहि पकरे गुरुचरण करार । कहै कबीर सुनो भाई साधो यहि ते रहियौ सदा होशियार ॥
इति शरण
अथ सतसंग कुसंगका वर्णन-चौपाई
सर्व शास्त्रको यामें एका । बिनसतसंग न उपजे विवेका ॥ बिनविवेक नहिं उज्जल करनी । जाते मुक्तिपन्थ पग धरनी ॥ सतसंगतकी महिमा भारी । लिखते शेष शारदा हारी ॥ वेद कतेब पार नहिं पावैं । संतनको नित गुन गन गावैं ॥
( १९६८ )
बोधसागर
६०
विधिहरि हर नितजाको ध्यावै । संतको भेद सोऊ नहि पावै ॥ सतसंगत सब सुखकी खानी । सर्वलाभ ताहीते जानी ॥ जो तप कीजै वर्ष हजारन । छनसतसंगत कष्ट नेवारन ॥ सत्यस्वरूपी ईश्वर कहिये । ताके भक्तन संगत गहिये ॥ तासु नाम सतसंग कहावै । सो संगतगहि जिव तरिजावै ॥ साधुनकी सेवा मन लावै । तब सतसंगतको नर पावै ॥ सतसंगत कह विविधि प्रकारा । तामें द्वैविधि मुख्य उचारा ॥ हरिभक्तन ढिग बैठन ढंगा । दुतिये वेद पाठ सतसंगा ॥ जोकर भगवतभक्तन सेवा । ताते मिलै परम गुरु देवा ॥ सदशास्त्रन पढ़ि तिनहि बिचारे । कंठ पाठ सुख तिनको धारे ॥ तेहि अनुसार कर्म सब करई । सार असार तहां निरुबरई ॥ सोई शास्त्र है जिव सुखदाई । जाते भक्ती सुक्ती पाई ॥ जाहि शास्त्रपढ़ितन मन भटके । ताको ले पानीमें पटकै ॥ जैसे साधन अरु सतसंगा । वर्णन वेदकीन बहु ढंगा ॥ हरिभक्तनकी सङ्गत जोई । तेहि समान कहु तुलै न कोई ॥ सतसङ्गत जो टूटन चहई । सबही ठौर ताहिको लहई ॥ अपने पापको कारण आही । सतसङ्गत जेहि दरसे नाहीं ॥ अपनी दृष्टि दोष जो धारे । तेहि कारण परदोष निहारे ॥ निजु दग दोष चंद द्वै दरसै । अंधेको अन्धेर सब सरसै ॥ भक्तीमें दृढ हो न जबलों । सतसंगत करते रह तबलों ॥ मनक्रम साधुकि सेवा गहिये । गाहीते सबही सुख लहिये ॥ साहिब सदा सन्तके साथ । विन सतसङ्ग न आवे हाथा ॥ सन्तजान साहिबकी देही । भक्तन सङ्ग पाइये तेही ॥ भक्तन सुख हरि भोजन करही । सदा सो तिनके सङ्ग विचरही ॥ वरन विवेक एक नहि करिये । साधु जानि सेवा चित धरिहे ॥
६१
जीवधर्मबोध
( ११६९ )
साधु सेवके वैरी पाँचा । तामें भटक जाय जिव काँचा ॥ रूप वरन विद्या बल धनमद । ताने जीवन लहै सेवापद ॥ जेते सुख श्रुति संत बखानी । तातो स्वर्ग मुक्ति सुखदानी ॥ ताहुते सुख अधिक जो होई । सत संगत सम तुलै न कोई ॥ सतसंगतसे ईश्वर पावै । ताते अधिक और कह गावै ॥ जहैं ईश्वर तहैं सुरगन छाया । सब दयाल जब प्रभुकी दया ॥ गुन गन युक्ति मुक्ति जिन पाई । जहैं लगिलखो विभूति भलाई ॥ सो सबही सतसंग प्रतापा । यह पद सब संतन मिलिथापा ॥ अब कुसंगको वर्णन करिये । दुष्ट देखि ततछन परिहरिये ॥ भरुअहि निज उर लेहु लगाई । दुष्ट संग याते दुखदाई ॥ सर्प तो एक प्रानकर घाता । कूंग संग ले नरक निपाता ॥ दोहूँ लोकमें काज विभंगा । मति मलीन हो किये कुसंगा ॥
इति
अथ मनमायाको वर्णन—कविच
यह मन महाराज मनहीहै यमराज मन कीने सब काज मन पोषत भरत है । ठाकुरवो ठग मन फैला सब जग मन कालवो दयाल मन तारत तरतहै ॥ मनसो न खोट मन कीने हरि ओट जिव भवमें डुबाय बरमायके छरत है । अकथ अनूप मन ईश्वर स्वरूप मन तिहुँ पुर भूप जो उपायके हरत है ॥
चौपाई
यह मन तीन लोकको नाथा । तीन देव इंद्री तेहि साथा ॥ गुन इंद्री याते प्रकटाही । पुनि यार्हमें लय है जाही ॥ यहि मनको कोइ भेद न जाना । सुर नर मुनि परे बंदीखाना ॥ ऊपर मन अरु हेठ है माया । तासुमध्य जग जीवनिकाया ॥
( १९७० )
बोधसागर
६२
चक्की चले दल सब जिवको । होहि पिसान न पावै पिवको ॥ कहा बापुरा जीव कडारा । सुरनरमुनिसबछलिछलिमारा ॥
कुंडलिया
चलती चक्की देखिके दिया कबीरा रोय । दोपट भीतर आनिके साबित गया न कोय ॥ साबित गया न कोय मिले नाहिं सन्त सनेही । कठिन कालको घेर फेर पर समुझावै तेही ॥ समुझाये जौंचेतसो किले सतगुरु अटको । फेर न पीसो जाय देख तेहि यमगनसटको ॥
चौपाई
यह मन सकलजक्त बिस्तारा । यहि मनको कछु वारन पारा ॥ मनको रचना सकल जहाना । सात प्रकार सृष्टि जग नाना ॥ मानुष देव नाग कहि देता । किन्नर पशु पच्छी अरु प्रेता ॥ सात जीव हैं सृष्टिके साता । तिनकी अब सुनिये यह बाता ॥
दोहा-स्वप्ना जाग्रत प्रथमपुनि, संकल्प जाग्रित होय ॥ केवल जाग्रत त्रितयकह, चिरजाग्रत चौथो होय ॥ पंचम दृढ़ जाग्रित कहै, छठे जाग्रत सुपनाहि ॥ सतय छोन जाग्रत कहो, सात सृष्टि यह आहि ॥
चौपाई
स्वपने विषे जो जाग्रत होई । स्वप्ना जाग्रत कहिये सोई ॥ पुनि संकल्प जाग्रतकह जोई । अजौं नींद नाहिं आई होई ॥ तामैं जो मनराज फुराना । तेहि मनराजमें जग दरसाना ॥ दृढ़ वासना भई तेहिमाही । पूर्व वासना बिसरी जो जाही ॥ यहि मनराजको रचित जो देही । अभिभूतकता दृढ़ गहयेही ॥
६३
जीवधर्मबोध
( १९७१ )
केवल जागृत तृतीये होई। परमात्म ततसे फूरोई ॥ सङ्कल्प मात्र जक्त जो गहई। निश्चय आत्म पदमें रहई ॥ चौथे चिर जागृत कह लाया। आत्मतत्त्वसे जो फुरिआया ॥ निश्चय करि जो ताको गहेऊ। जन्मांतरको प्राप्ति जो भयऊ ॥ पंचम सुषुप्ति जागृत नाना। हृद घनभूत जो होय वासना ॥ पाप कर्म करि नो मन लाया। ताते थावर यूनी पाया ॥ षष्ठहि स्वपना जागृत कहिये। जब संतनकी सङ्ग्नत गहिये ॥ पट्टि सच्छास्त्र भयो जो बोधा। नहिं विचारनिज मनकोशोधा ॥ तबसो जागृत स्वपना होई। शुद्धबोध उर थपना होई ॥ सप्तम बोध विषे हृद जोई। तुरिया नाम कहावे सोई ॥ छौंन जागृत सो नाम बखाना। परमानंद प्राप्ति जिव जाना ॥ सप्त सृष्टि मन राजा केरो। मन जीते न करे भव फेरो ॥
सत्यकबीर वचन
सारखी-कबीर मन गोरख मन गोविंदा, मनही औघड होय।
जो मनराखै जतनकरि, तो आपै करता होय ॥
कबीरकीटिकर्मपलमें, करे यह मन विषयास्वाद।
सतगुरु शब्द माना नहीं, जन्म गँवाया बाद ॥
कबीर मन पंछी भया, बहुत चढ़ा आकाश।
ऊहाँ हांत गिर पड़ा, मन मायाके पास ॥
कबीर-मन जो गया तो जानदे, गहिके राख शरीर।
उतरी परी कमान है, कयोंकर लोंगै तीर ॥
छन्द भुजंगप्रयात
महामत्त मातंग निर्द्भन्द गाजा।
गहै कौन पावै मनी रामराजा।
लियौ योगमा छन्दरा नाथ केरा।
( १९७२ )
बोधसागर
६४
तपी सूर सिद्धा जपी नर्क गेरा ॥ यही जीवको नित्य बहकावता है । यही ज्ञानी ध्यानीको डहकावता है ॥ महाकाल अन्याइया जो कही है । यही है यही है यही है यही है ॥
इति मन
अथ बाकुंडीको दमन-चौपाई
शम दमादि यह जिवको कर्मा । गहे सुचाल बहे सब भर्मा ॥ प्रथम वाक इंद्दी वश करना । सुधा वचनते जगमन हरना ॥ भलिविधि बूझिविचारिके बोले । जीनबाक विष अमृत घोले ॥ कटुकवचनविषे कबहुँ न कहिये । जाते श्रोताको उर दहिये ॥ काहूसे बोलो मति करुई । ऐसो ऊंच न ऐसो हरुई ॥ मध्य बोल तोलके आनो । धर्म नीतिमय वचन बखानो ॥ द्वै नर जबहि करे कनफुसकी । कान लगावन तब दिश उसकी ॥ जब द्वै मानुष बात कराही । बात न काटो तिनके माही ॥ वचन पै तर्क करे जो कोई । शुद्ध होय तो मानो सोई ॥ वृथा पक्ष निज बात न करिये । शुद्धको गह अशुद्ध परहरिये ॥ तर्क करत जो आपते ऊंचा । तो तामें ही रहिये नीचा ॥ मिथ्या निन्दा तजो भदेशा । सत्य वचन कर हित उपदेशा ॥ वेदपाठ कर विद्या दाना । पात्र कुपात्र भले पहिचाना ॥ वेद पाठ सच्छास्त्र उचारी । धर्म की विद्या कर्म सुधारी ॥ श्रुति ज्ञान विज्ञान कि पौरी । तासु प्रताप विदित सब ठौरी ॥ कथनी मती महम्मदको है । विद्या सहित साधु किमि सोहै ॥ पूर्णचन्द्र जिमि तारागनमें । विद्वज्जन तिनि तपसिन घनमें ॥ निद्रावश जो पंडित होऊ । सूरखके तपते भल सोऊ ॥
६५
जीवधर्मबोध
( १९७३ )
विद्या होय विनय संपन्या । ता पंडितको कहिये धन्या ॥ विद्या पढ़ि अभिमान भुलाना । सो जिव कीनो यमपुर थाना ॥ रसना सब संशयको छेदा । परमपंथको पावै भेदा ॥ रसना द्वार ज्ञान गुन आवै । रसना द्वार अगनि गति पावै ॥
इति रसना
अथ नेत्र और श्रवणका दमन—चौपाई
निज दृग दमन करो यहि लेखे । अन देखनी वस्तु मति देखे ॥ गुप्तस्थान मनुष्य पशु केरा । अति विशेष नहिं तादिशहेरा ॥ नरपशु परदा देख न जैसो । परे कुवानि जाहिमें ऐसो ॥ काल पाय निज दृष्टि गवावै । सो अवश्य अंधा है जावै ॥ जो परिच्छिद्र निहारन हारे । दुःखी होहिविन सुमति विचारे ॥ करता कृत निज दृष्टि निहारी । प्रभुहि सराह जीव तप भारी ॥ काम अरु कोध कुदृष्टि न हरे । सहज सुभाव नैन निज फेरे ॥ कामदृष्टि परतियपर डाले । जनु मैथुन करि धर्महि चाले ॥ निज पत्रिका लिखत जब कोई । ताहि न पढ़ो न निज दृगजोई ॥ जब तिय संग अनंग बिहारी । तब न गुप्त अस्थान निहारी ॥ जौ तादिश तेहिकालमें देखे । जन्मे पुत्र अंध यहि लेखे ॥ नैन न माह निरंजन थाना । स्वसंवेद इमि करे बखाना ॥ दृगन सपक्षी माह बसेरा । भोग हेत निज नैनन फेरा ॥ भोगे भोग दृगन आसीना । ताको छल नहिं कोई चीन्हा ॥ मन चंचल नैनन चपलाई । मन थिर हो तिनकी थिरताई ॥ नेत्रनमें है यमको बासा । सोइ जीव गल डारे फांसा ॥ जब जिव रोग सोग तन छावै । सबही अंग छीन है जावै ॥ नैन होहि कबहु नहिं छीना । सदा एकरस देखी पीना ॥ कैसहु कुशित रोग मल घेरी । ज्योति अघट्ट निरंजन केरी ॥
( १९७४ )
बोधसागर
६६
अंधी आंख निरंजन जूझे । विन देखे मुनि सब कछु बूझे ॥ ताते साधु प्रथम दृग बांधे । पीछे मन इंद्दीको साधे ॥ श्रवणको ऐसे कीजै दमना । अनमुनती बातें मति मुनना ॥ चुगली चाई निंदा वानी । सुने न श्रवण जीव जो ज्ञानी ॥ महा प्रबल इंद्दी हैं येही । जीवहि दुःखसुख व्यापे जेही ॥ गुरुपदेश कि कथा बताया । जीयत कैदी हाड तोडाया ॥ देखन ताहि जुरे नारीनर । एक गर्भिणी रहे तिहि ठाहर ॥ कैदी हाड लगा जब टूटे । निरखि गर्भिणी धीरज छूटे ॥ फिर देखी जब लोग लोगाई । सबही निजुनिजु भौन सिधाई ॥ निजघर जाय गर्भिनी बाला । कैदी सुरति कीन कछु काला ॥ मुनि ताको दोन्हो बिसराई । गर्भ कि थित सरनता पाई ॥ जन्मौ पुत्र तिहि औसर नारी । ता शिशुकी यह दशा निहारी ॥ कैदी अस्थि टुटी रह जेतो । बालक हाट टुटा सब तेतो ॥ हस्पताल सो शिशुले गयऊ । बीसवर्ष लो जीअत रहेऊ ॥ टूटा हाड़ बाल सो जीया । औषध ताहि न कछु गुनकीया ॥ मातु दृष्टि बालक दुःख पाया । गर्भहि निजु हाड़ तोड़ाया ॥ ऐसो नैन महाबलवाना । व्यासदृष्टि सुत तीनउपाना ॥ ऐसहि श्रवन प्रबलकहि गानो । एकबारकी कथा बखानो ॥ बंधा परा रहै जिहि ठाई । एक कलावत तहैं चलि आई ॥ गावन और बजावन लागा । सुनते बौरा मन अचुरागा ॥ बौरा रागको भेदी रहई । मुनि सुर ताल प्रीति अतिगहई ॥ परे परे निज अंग हलावै । ज्यों सुरताल कि गतिसुनि पावै ॥ परे परे निज अंग हलावै । खाट से खोलि दियौ पुनि वाको ॥ गुंगे बहिरे चंगे होई । श्रवण नयन हारे ते जोई ॥
६७
जीवधर्मबोध
( १९७५ )
प्राण देत मृग मधुरीबानी । ऐसहि प्रबल नासिका जानी ॥ इंद्री सकल अकलको हरही । ले सब जिव भवसागर भरही ॥
इति नेत्र श्रवण दमन
अथ हाथ पांवको दमन-चौपाई
उत्तर कर्म करनते कीजै । काहूको मति दुःख कछु दीजै ॥ पंथमें पाहन कंटक होई । करते दूर डार गह सोई ॥ दान पुन्य हाथन ते करिये । दुःखी दीनको सुखते भरिये ॥ मन्दे कर्मन हाथ उठाये । परधन परतिय दिस न चलाये ॥ चरननको यह कर्म बखाना । हरितीरथ सतसंगत जाना ॥ संतदरस रोगी सोगी पह । यथा योग चलके दुःखदलतह ॥ हरुये हरुये महि पग धरई । देखत चले न जिव कोइ मरई ॥ लाखन जिव पायनतर आवै । दाया करिके तिनहि बचावै ॥
इति हाथ पांवको दमन
अथ श्रेष्ठ पुरुषनकी सभा प्रवेश वर्णन-चौपाई
श्रेष्ठ सभामें जब पग दीजै । तहैं सब कर्म विचारते कीजै ॥ सभामध्य जेहिँ औसर पैठे । आज्ञा पाय तहां तब बैठे ॥ त्रिन बोले नहिँ बोलो बोला । बिन पूछे कछु भेद न खोला ॥ बुद्धि विरुद्ध न बोलो बानी । जाकी कोई प्रतीत न आनी ॥ बहुत बड़ाई अस्तुति छोड़ो । निंदा चुगुलीते सुख मोड़ो ॥ कबहुँ न निजगन बुद्धि सराहा । दुःखमतिभाषो सभा उच्छाहा ॥ ऐसो वचन कहो जनि ताही । मनभायक नरनायक नाही ॥
इति सभाप्रवेश
अथ मद्यमांस अभक्ष्यवर्णन-चौपाई
मद्य मांस भक्षमलिनबखानी । ताहि न ग्रहन करे नर ज्ञानी ॥ निज निजहृदय विचारो येहा । मल अरु मूत्र कि जेती देहा ॥
( १९७६ )
बोधसागर
६८
सकल अभक्ष धिनावन सोई । चहुँ खानि जलमलते होई ॥ शुद्ध अशुद्ध ताहि पहिचानी । जलकृत शुद्ध अशुद्ध मलानी ॥ मलकृत जो जिव जंतु उपाये । हो अज्ञान ताहिके खाये ॥ जलकृत जो फल अन्न अंकुरा । ताते भूखको दुःख कर दूरा ॥ नरपशु जीव जंतु खग नाना । सबको दुःख सुख एक समाना ॥ नरपशु खग जो मासके भक्षक । सो नहिं कबहु जीवके रक्षक ॥ जिनके हृदये दाया नाही । सोई अधोगति मांह समाहीं ॥ मांसु अहारीके कस दाया । एकखाय बहु मारि गिराया ॥ जो कोई काहूको दुःख देहै । बदला तासु आप शिर लेहै ॥ सुरापान अरु मांसु अहारी । नरकधाम सो अवश्य सिधारी ॥
सत्यकबीर वचन
साखी-कबीर-मासुअहारीमानुवा, परतख राक्षस जान ।
ताकोसंगत मतिकरो, होयभक्तिमें हान ॥
कबीर-काजी को बेटा सुवा, उरमें सालै पीर ।
वह साहिब सबको पिता, भला न मानै वीर ॥
कबीर काटाकृटि जे, करे यह परखण्डको भेस ।
निश्चयराम न जानही, कहै कबीर संदेह ॥
कबीर-करता हूँ कहि जातहो, कहा जो मान हमार ।
जिसका गलातुकाटिसो, फिर गलाकाटितुमार ॥
चौपाई
मुसलमान आदिक ईसाई । कबहु मदामि अशुचि बताई ॥
ईसाइनमें एक जमाती । अमली नहिं बैठे तिन पाती ॥
अथ टेम्पेरिस मुसैटीको वर्णन-चौपाई
टीटो टलर मुसैटी नाऊ । टेम्पेरिस बहुरी बतलाऊ ॥
दोऊ नाम अंगरेजी भाषा । अमल त्यागियोंकी यह सापा ॥
६९
जीवधर्मबोध
( १९७७ )
जगमें जेते अमलको नामा । तिनके लेखे सकल हरामा ॥ तिहि मंडली मिलै जो कोई । यह सौगंध करावे सोई ॥ आजते कौल करार हमारा । कोई अमल मुखमें नहीं डारा ॥ आप न खाय न औरहि देही । नहीं बेचै न बेचावै येही ॥ कबहुँ न करे तासु व्यौहारा । अमल निकट नहीं निजु पगधारा ॥ जो कोइ ऐसो नियम गहावै । कागज परवाना लिखपावै ॥ सो परवाना निजु ढिग राखे । मूलि कबहुँ कछु अमल न चाखे ॥ जिनके मते ग्रंथ बहुतेरा । विषहू ते विष अमल बडेरा ॥ सबही अमलकि निंदा करही । टीटो टलर धर्म आचरही ॥ जो कोइ क्रियामें होय न पक्का । तेहि जमातिसे पावै धक्का ॥ यूरुम नर केते यहि माही । टीटो टलरको धर्म धराही ॥ सुसलमान साधू बहुतेरे । मांसअहार कबहु ना हेरे ॥ धर्म अहिंसा सम नहीं आना । वेदविदित सब संतन जाना ॥
नानकशाह वचन
क्या बकरी क्या भेड है क्या आपन जाया । रक्तमासु सब एक है तुके किन फरमाया ॥ नानक घट परचै भई सबही घट पीरा ॥ सकलजत्तके आतमा महबूब कबीरा ॥
इति मयमांस अमल सर्वथा अभक्ष
अथ विचार जीवहितकारी वर्णन
कवित्त-बोलत विचार कर डोलत विचार कर सुक्तिद्वार पालन विचार सरदार है । बैठत विचार कर उठत विचार कर हाट बाट घाटहू विचार घरबार है ॥ योगहू समाधि माँह ज्ञानहू अगाध माँह साथक अरु सिद्धको विचार सब सार है । रनवन घन यज्ञदान सुमिरन महँ जहँ तहँ देखिये विचार जिव तार है ॥
( १९७८ )
बोधसागर
७०
सोरठा-जीवधर्म है येह, बारहि बार बिचार कर । मैं कह कह मम देह, केहि कारण फंदेशरा ॥
चौपाई
करत बिचार होय उजियारा । तेहि प्रकाश निज दोष निहारा ॥ जब आपनो दोष लखि लीजै । तासु नाश हित उद्यम कीजै ॥ स्वसंवेद वद भेद अनूषा । प्रथमै जिवको सत्य स्वरूपा ॥ सो सब प्रथमहि कहे बखानी । जाते जीव अमै चहुँ खानी ॥ अपने फन्दमें आप फँसाई । आपै आप रहा भरमाई ॥
सत्यकबीर वचन-शब्द
अपनेको आपही बिसरो ।
जैसे श्वान काँचि मंदिरमें भर्मत भूसि मरो ॥
ज्यों केहरि वपु निरखिकूप जल प्रतिमा देखि परो ।
ऐसेही गज लखि स्फटिकशिलामें दूरसन हीते अरो ॥
मरकट मूठी स्वाद न छोड़ै घर घर रटत फिरो ।
कहै कबीर नलनिके सुगना कौने तोहि पकरो ॥
दोहा-मनकी वृत्ती पंच है, प्रथम कहे परमान ॥
बीपरजयो विकल्पकह, निद्रास्मृति मान ॥
चौपाई
मनकी वृत्ती पंच उच्चार । मनहीको है सकल पसारा ॥
सुन स्वरूप भर्म यह मन है । तेहि कारण सब योग जतन है ॥
मन बिनसात जक्त बिनसाना । अंडर्पिंड दोउ शून्य समाना ॥
जड़ शरीर चेतन चित्त संगा । कर्म फन्द जिव ज्ञान विभंगा ॥
जड़चेतन जन होय मिलौनी । दुःखसुख भोगे सुर नर मौनी ॥
द्वंद्वते परा जीव को धोखा । कौन भांतिसे पावै मोखा ॥
जिव निरद्वंद्व दोहू ते न्यारा । सत्य स्वरूपी अगम अपारा ॥
७१
जीवधर्मबोध
( ११७१ )
पांच तत्त्वको जानन वारा । सदा सो इन पांचोंते न्यारा ॥ मन इन्द्री निरगुनते पारा । आप भूलि गल फन्दा डारा ॥
सोरठा-फन्दपरा जब जीव, अपनो रूपबिसारके । दृढन लागा पीव, विविधि प्रकारकी यतनकरि ॥
चौपाई
जिमि कपिकण्ठलगी जंजीरा । बँधा रहै बांसके तीरा ॥ कबहुंके बांस ऊपर चढ़ि आवै । कबहुंके हेठ उतरि सो आवै ॥ उतरा चढ़ि न छूटै ताकौ । दृढ़ जंजीर परी गल वाको ॥ तिमि जिव कमहीक्रम लहदेही । बिनसतगुरु पद पाव न येही ॥ जब जंजीर गलेकी छूटै । तब जिवरूप आपनो जूटै ॥ वपु विज्ञान शिखरकी चोटी । देही थूल मूल महि मोटी ॥ मूलते जब चोटी चढ़ि जावै । निज प्रतिबिंबै ध्यान लगावै ॥ ऊपर हेठ लख मोर स्वरूपा । झाँई भेद न जाने गुपा ॥ यही देहु विज्ञान कहावै । झाँई निरखि अपनको गावै ॥ जैसे तप्त तीख अंगारा । पर ताहीपर क्रमक्रम छारा ॥ ज्ञान अग्नि जब अन्त बुझाई । थूल शरीर बहुरि जिव पाई ॥ पुनि करि यत्न अग्नि उदगारा । तब विज्ञान देह सौ धारा ॥ होय जाय इमि कालहि पाई । आवागौन सूत्र नहि जाई ॥ जब कपि कंठ कड़ी गुरु छोरै । तब भ्रम धोखा होय न भोरै ॥ बन्धन सो विज्ञान कि देही । आवागौन न छूटै जेही ॥ इहां लगि वेद पुरान बखाना । आगे मरम न कोई जाना ॥ दशों दिशा दश सूरज होई । तब छाया नहि दूरसै कोई ॥ छाया माया होय विनाशा । जीवहि निजुस्वरूप तब भासा ॥ दशों दिशा जब रवि खरधारा । प्रलय होय तबही संसारा ॥ जहँ संसार तहाँ नहि ज्ञाना । जहाँ ज्ञान तहँ जक्त नसाना ॥