कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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बोधसागर
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अंधी आंख निरंजन जूझे । विन देखे मुनि सब कछु बूझे ॥ ताते साधु प्रथम दृग बांधे । पीछे मन इंद्दीको साधे ॥ श्रवणको ऐसे कीजै दमना । अनमुनती बातें मति मुनना ॥ चुगली चाई निंदा वानी । सुने न श्रवण जीव जो ज्ञानी ॥ महा प्रबल इंद्दी हैं येही । जीवहि दुःखसुख व्यापे जेही ॥ गुरुपदेश कि कथा बताया । जीयत कैदी हाड तोडाया ॥ देखन ताहि जुरे नारीनर । एक गर्भिणी रहे तिहि ठाहर ॥ कैदी हाड लगा जब टूटे । निरखि गर्भिणी धीरज छूटे ॥ फिर देखी जब लोग लोगाई । सबही निजुनिजु भौन सिधाई ॥ निजघर जाय गर्भिनी बाला । कैदी सुरति कीन कछु काला ॥ मुनि ताको दोन्हो बिसराई । गर्भ कि थित सरनता पाई ॥ जन्मौ पुत्र तिहि औसर नारी । ता शिशुकी यह दशा निहारी ॥ कैदी अस्थि टुटी रह जेतो । बालक हाट टुटा सब तेतो ॥ हस्पताल सो शिशुले गयऊ । बीसवर्ष लो जीअत रहेऊ ॥ टूटा हाड़ बाल सो जीया । औषध ताहि न कछु गुनकीया ॥ मातु दृष्टि बालक दुःख पाया । गर्भहि निजु हाड़ तोड़ाया ॥ ऐसो नैन महाबलवाना । व्यासदृष्टि सुत तीनउपाना ॥ ऐसहि श्रवन प्रबलकहि गानो । एकबारकी कथा बखानो ॥ बंधा परा रहै जिहि ठाई । एक कलावत तहैं चलि आई ॥ गावन और बजावन लागा । सुनते बौरा मन अचुरागा ॥ बौरा रागको भेदी रहई । मुनि सुर ताल प्रीति अतिगहई ॥ परे परे निज अंग हलावै । ज्यों सुरताल कि गतिसुनि पावै ॥ परे परे निज अंग हलावै । खाट से खोलि दियौ पुनि वाको ॥ गुंगे बहिरे चंगे होई । श्रवण नयन हारे ते जोई ॥