भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 2053, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2053

६७

जीवधर्मबोध

( १९७५ )

प्राण देत मृग मधुरीबानी । ऐसहि प्रबल नासिका जानी ॥ इंद्री सकल अकलको हरही । ले सब जिव भवसागर भरही ॥

इति नेत्र श्रवण दमन

अथ हाथ पांवको दमन-चौपाई

उत्तर कर्म करनते कीजै । काहूको मति दुःख कछु दीजै ॥ पंथमें पाहन कंटक होई । करते दूर डार गह सोई ॥ दान पुन्य हाथन ते करिये । दुःखी दीनको सुखते भरिये ॥ मन्दे कर्मन हाथ उठाये । परधन परतिय दिस न चलाये ॥ चरननको यह कर्म बखाना । हरितीरथ सतसंगत जाना ॥ संतदरस रोगी सोगी पह । यथा योग चलके दुःखदलतह ॥ हरुये हरुये महि पग धरई । देखत चले न जिव कोइ मरई ॥ लाखन जिव पायनतर आवै । दाया करिके तिनहि बचावै ॥

इति हाथ पांवको दमन

अथ श्रेष्ठ पुरुषनकी सभा प्रवेश वर्णन-चौपाई

श्रेष्ठ सभामें जब पग दीजै । तहैं सब कर्म विचारते कीजै ॥ सभामध्य जेहिँ औसर पैठे । आज्ञा पाय तहां तब बैठे ॥ त्रिन बोले नहिँ बोलो बोला । बिन पूछे कछु भेद न खोला ॥ बुद्धि विरुद्ध न बोलो बानी । जाकी कोई प्रतीत न आनी ॥ बहुत बड़ाई अस्तुति छोड़ो । निंदा चुगुलीते सुख मोड़ो ॥ कबहुँ न निजगन बुद्धि सराहा । दुःखमतिभाषो सभा उच्छाहा ॥ ऐसो वचन कहो जनि ताही । मनभायक नरनायक नाही ॥

इति सभाप्रवेश

अथ मद्यमांस अभक्ष्यवर्णन-चौपाई

मद्य मांस भक्षमलिनबखानी । ताहि न ग्रहन करे नर ज्ञानी ॥ निज निजहृदय विचारो येहा । मल अरु मूत्र कि जेती देहा ॥