भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 2051, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2051

६५

जीवधर्मबोध

( १९७३ )

विद्या होय विनय संपन्या । ता पंडितको कहिये धन्या ॥ विद्या पढ़ि अभिमान भुलाना । सो जिव कीनो यमपुर थाना ॥ रसना सब संशयको छेदा । परमपंथको पावै भेदा ॥ रसना द्वार ज्ञान गुन आवै । रसना द्वार अगनि गति पावै ॥

इति रसना

अथ नेत्र और श्रवणका दमन—चौपाई

निज दृग दमन करो यहि लेखे । अन देखनी वस्तु मति देखे ॥ गुप्तस्थान मनुष्य पशु केरा । अति विशेष नहिं तादिशहेरा ॥ नरपशु परदा देख न जैसो । परे कुवानि जाहिमें ऐसो ॥ काल पाय निज दृष्टि गवावै । सो अवश्य अंधा है जावै ॥ जो परिच्छिद्र निहारन हारे । दुःखी होहिविन सुमति विचारे ॥ करता कृत निज दृष्टि निहारी । प्रभुहि सराह जीव तप भारी ॥ काम अरु कोध कुदृष्टि न हरे । सहज सुभाव नैन निज फेरे ॥ कामदृष्टि परतियपर डाले । जनु मैथुन करि धर्महि चाले ॥ निज पत्रिका लिखत जब कोई । ताहि न पढ़ो न निज दृगजोई ॥ जब तिय संग अनंग बिहारी । तब न गुप्त अस्थान निहारी ॥ जौ तादिश तेहिकालमें देखे । जन्मे पुत्र अंध यहि लेखे ॥ नैन न माह निरंजन थाना । स्वसंवेद इमि करे बखाना ॥ दृगन सपक्षी माह बसेरा । भोग हेत निज नैनन फेरा ॥ भोगे भोग दृगन आसीना । ताको छल नहिं कोई चीन्हा ॥ मन चंचल नैनन चपलाई । मन थिर हो तिनकी थिरताई ॥ नेत्रनमें है यमको बासा । सोइ जीव गल डारे फांसा ॥ जब जिव रोग सोग तन छावै । सबही अंग छीन है जावै ॥ नैन होहि कबहु नहिं छीना । सदा एकरस देखी पीना ॥ कैसहु कुशित रोग मल घेरी । ज्योति अघट्ट निरंजन केरी ॥