कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १९७२ )
बोधसागर
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तपी सूर सिद्धा जपी नर्क गेरा ॥ यही जीवको नित्य बहकावता है । यही ज्ञानी ध्यानीको डहकावता है ॥ महाकाल अन्याइया जो कही है । यही है यही है यही है यही है ॥
इति मन
अथ बाकुंडीको दमन-चौपाई
शम दमादि यह जिवको कर्मा । गहे सुचाल बहे सब भर्मा ॥ प्रथम वाक इंद्दी वश करना । सुधा वचनते जगमन हरना ॥ भलिविधि बूझिविचारिके बोले । जीनबाक विष अमृत घोले ॥ कटुकवचनविषे कबहुँ न कहिये । जाते श्रोताको उर दहिये ॥ काहूसे बोलो मति करुई । ऐसो ऊंच न ऐसो हरुई ॥ मध्य बोल तोलके आनो । धर्म नीतिमय वचन बखानो ॥ द्वै नर जबहि करे कनफुसकी । कान लगावन तब दिश उसकी ॥ जब द्वै मानुष बात कराही । बात न काटो तिनके माही ॥ वचन पै तर्क करे जो कोई । शुद्ध होय तो मानो सोई ॥ वृथा पक्ष निज बात न करिये । शुद्धको गह अशुद्ध परहरिये ॥ तर्क करत जो आपते ऊंचा । तो तामें ही रहिये नीचा ॥ मिथ्या निन्दा तजो भदेशा । सत्य वचन कर हित उपदेशा ॥ वेदपाठ कर विद्या दाना । पात्र कुपात्र भले पहिचाना ॥ वेद पाठ सच्छास्त्र उचारी । धर्म की विद्या कर्म सुधारी ॥ श्रुति ज्ञान विज्ञान कि पौरी । तासु प्रताप विदित सब ठौरी ॥ कथनी मती महम्मदको है । विद्या सहित साधु किमि सोहै ॥ पूर्णचन्द्र जिमि तारागनमें । विद्वज्जन तिनि तपसिन घनमें ॥ निद्रावश जो पंडित होऊ । सूरखके तपते भल सोऊ ॥