कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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जीवधर्मबोध
( १९७१ )
केवल जागृत तृतीये होई। परमात्म ततसे फूरोई ॥ सङ्कल्प मात्र जक्त जो गहई। निश्चय आत्म पदमें रहई ॥ चौथे चिर जागृत कह लाया। आत्मतत्त्वसे जो फुरिआया ॥ निश्चय करि जो ताको गहेऊ। जन्मांतरको प्राप्ति जो भयऊ ॥ पंचम सुषुप्ति जागृत नाना। हृद घनभूत जो होय वासना ॥ पाप कर्म करि नो मन लाया। ताते थावर यूनी पाया ॥ षष्ठहि स्वपना जागृत कहिये। जब संतनकी सङ्ग्नत गहिये ॥ पट्टि सच्छास्त्र भयो जो बोधा। नहिं विचारनिज मनकोशोधा ॥ तबसो जागृत स्वपना होई। शुद्धबोध उर थपना होई ॥ सप्तम बोध विषे हृद जोई। तुरिया नाम कहावे सोई ॥ छौंन जागृत सो नाम बखाना। परमानंद प्राप्ति जिव जाना ॥ सप्त सृष्टि मन राजा केरो। मन जीते न करे भव फेरो ॥
सत्यकबीर वचन
सारखी-कबीर मन गोरख मन गोविंदा, मनही औघड होय।
जो मनराखै जतनकरि, तो आपै करता होय ॥
कबीरकीटिकर्मपलमें, करे यह मन विषयास्वाद।
सतगुरु शब्द माना नहीं, जन्म गँवाया बाद ॥
कबीर मन पंछी भया, बहुत चढ़ा आकाश।
ऊहाँ हांत गिर पड़ा, मन मायाके पास ॥
कबीर-मन जो गया तो जानदे, गहिके राख शरीर।
उतरी परी कमान है, कयोंकर लोंगै तीर ॥
छन्द भुजंगप्रयात
महामत्त मातंग निर्द्भन्द गाजा।
गहै कौन पावै मनी रामराजा।
लियौ योगमा छन्दरा नाथ केरा।