भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९७० )

बोधसागर

६२

चक्की चले दल सब जिवको । होहि पिसान न पावै पिवको ॥ कहा बापुरा जीव कडारा । सुरनरमुनिसबछलिछलिमारा ॥

कुंडलिया

चलती चक्की देखिके दिया कबीरा रोय । दोपट भीतर आनिके साबित गया न कोय ॥ साबित गया न कोय मिले नाहिं सन्त सनेही । कठिन कालको घेर फेर पर समुझावै तेही ॥ समुझाये जौंचेतसो किले सतगुरु अटको । फेर न पीसो जाय देख तेहि यमगनसटको ॥

चौपाई

यह मन सकलजक्त बिस्तारा । यहि मनको कछु वारन पारा ॥ मनको रचना सकल जहाना । सात प्रकार सृष्टि जग नाना ॥ मानुष देव नाग कहि देता । किन्नर पशु पच्छी अरु प्रेता ॥ सात जीव हैं सृष्टिके साता । तिनकी अब सुनिये यह बाता ॥

दोहा-स्वप्ना जाग्रत प्रथमपुनि, संकल्प जाग्रित होय ॥ केवल जाग्रत त्रितयकह, चिरजाग्रत चौथो होय ॥ पंचम दृढ़ जाग्रित कहै, छठे जाग्रत सुपनाहि ॥ सतय छोन जाग्रत कहो, सात सृष्टि यह आहि ॥

चौपाई

स्वपने विषे जो जाग्रत होई । स्वप्ना जाग्रत कहिये सोई ॥ पुनि संकल्प जाग्रतकह जोई । अजौं नींद नाहिं आई होई ॥ तामैं जो मनराज फुराना । तेहि मनराजमें जग दरसाना ॥ दृढ़ वासना भई तेहिमाही । पूर्व वासना बिसरी जो जाही ॥ यहि मनराजको रचित जो देही । अभिभूतकता दृढ़ गहयेही ॥