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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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६३

जीवधर्मबोध

( १९७१ )

केवल जागृत तृतीये होई। परमात्म ततसे फूरोई ॥ सङ्कल्प मात्र जक्त जो गहई। निश्चय आत्म पदमें रहई ॥ चौथे चिर जागृत कह लाया। आत्मतत्त्वसे जो फुरिआया ॥ निश्चय करि जो ताको गहेऊ। जन्मांतरको प्राप्ति जो भयऊ ॥ पंचम सुषुप्ति जागृत नाना। हृद घनभूत जो होय वासना ॥ पाप कर्म करि नो मन लाया। ताते थावर यूनी पाया ॥ षष्ठहि स्वपना जागृत कहिये। जब संतनकी सङ्ग्नत गहिये ॥ पट्टि सच्छास्त्र भयो जो बोधा। नहिं विचारनिज मनकोशोधा ॥ तबसो जागृत स्वपना होई। शुद्धबोध उर थपना होई ॥ सप्तम बोध विषे हृद जोई। तुरिया नाम कहावे सोई ॥ छौंन जागृत सो नाम बखाना। परमानंद प्राप्ति जिव जाना ॥ सप्त सृष्टि मन राजा केरो। मन जीते न करे भव फेरो ॥

सत्यकबीर वचन

सारखी-कबीर मन गोरख मन गोविंदा, मनही औघड होय।

जो मनराखै जतनकरि, तो आपै करता होय ॥

कबीरकीटिकर्मपलमें, करे यह मन विषयास्वाद।

सतगुरु शब्द माना नहीं, जन्म गँवाया बाद ॥

कबीर मन पंछी भया, बहुत चढ़ा आकाश।

ऊहाँ हांत गिर पड़ा, मन मायाके पास ॥

कबीर-मन जो गया तो जानदे, गहिके राख शरीर।

उतरी परी कमान है, कयोंकर लोंगै तीर ॥

छन्द भुजंगप्रयात

महामत्त मातंग निर्द्भन्द गाजा।

गहै कौन पावै मनी रामराजा।

लियौ योगमा छन्दरा नाथ केरा।

( १९७२ )

बोधसागर

६४

तपी सूर सिद्धा जपी नर्क गेरा ॥ यही जीवको नित्य बहकावता है । यही ज्ञानी ध्यानीको डहकावता है ॥ महाकाल अन्याइया जो कही है । यही है यही है यही है यही है ॥

इति मन

अथ बाकुंडीको दमन-चौपाई

शम दमादि यह जिवको कर्मा । गहे सुचाल बहे सब भर्मा ॥ प्रथम वाक इंद्दी वश करना । सुधा वचनते जगमन हरना ॥ भलिविधि बूझिविचारिके बोले । जीनबाक विष अमृत घोले ॥ कटुकवचनविषे कबहुँ न कहिये । जाते श्रोताको उर दहिये ॥ काहूसे बोलो मति करुई । ऐसो ऊंच न ऐसो हरुई ॥ मध्य बोल तोलके आनो । धर्म नीतिमय वचन बखानो ॥ द्वै नर जबहि करे कनफुसकी । कान लगावन तब दिश उसकी ॥ जब द्वै मानुष बात कराही । बात न काटो तिनके माही ॥ वचन पै तर्क करे जो कोई । शुद्ध होय तो मानो सोई ॥ वृथा पक्ष निज बात न करिये । शुद्धको गह अशुद्ध परहरिये ॥ तर्क करत जो आपते ऊंचा । तो तामें ही रहिये नीचा ॥ मिथ्या निन्दा तजो भदेशा । सत्य वचन कर हित उपदेशा ॥ वेदपाठ कर विद्या दाना । पात्र कुपात्र भले पहिचाना ॥ वेद पाठ सच्छास्त्र उचारी । धर्म की विद्या कर्म सुधारी ॥ श्रुति ज्ञान विज्ञान कि पौरी । तासु प्रताप विदित सब ठौरी ॥ कथनी मती महम्मदको है । विद्या सहित साधु किमि सोहै ॥ पूर्णचन्द्र जिमि तारागनमें । विद्वज्जन तिनि तपसिन घनमें ॥ निद्रावश जो पंडित होऊ । सूरखके तपते भल सोऊ ॥

६५

जीवधर्मबोध

( १९७३ )

विद्या होय विनय संपन्या । ता पंडितको कहिये धन्या ॥ विद्या पढ़ि अभिमान भुलाना । सो जिव कीनो यमपुर थाना ॥ रसना सब संशयको छेदा । परमपंथको पावै भेदा ॥ रसना द्वार ज्ञान गुन आवै । रसना द्वार अगनि गति पावै ॥

इति रसना

अथ नेत्र और श्रवणका दमन—चौपाई

निज दृग दमन करो यहि लेखे । अन देखनी वस्तु मति देखे ॥ गुप्तस्थान मनुष्य पशु केरा । अति विशेष नहिं तादिशहेरा ॥ नरपशु परदा देख न जैसो । परे कुवानि जाहिमें ऐसो ॥ काल पाय निज दृष्टि गवावै । सो अवश्य अंधा है जावै ॥ जो परिच्छिद्र निहारन हारे । दुःखी होहिविन सुमति विचारे ॥ करता कृत निज दृष्टि निहारी । प्रभुहि सराह जीव तप भारी ॥ काम अरु कोध कुदृष्टि न हरे । सहज सुभाव नैन निज फेरे ॥ कामदृष्टि परतियपर डाले । जनु मैथुन करि धर्महि चाले ॥ निज पत्रिका लिखत जब कोई । ताहि न पढ़ो न निज दृगजोई ॥ जब तिय संग अनंग बिहारी । तब न गुप्त अस्थान निहारी ॥ जौ तादिश तेहिकालमें देखे । जन्मे पुत्र अंध यहि लेखे ॥ नैन न माह निरंजन थाना । स्वसंवेद इमि करे बखाना ॥ दृगन सपक्षी माह बसेरा । भोग हेत निज नैनन फेरा ॥ भोगे भोग दृगन आसीना । ताको छल नहिं कोई चीन्हा ॥ मन चंचल नैनन चपलाई । मन थिर हो तिनकी थिरताई ॥ नेत्रनमें है यमको बासा । सोइ जीव गल डारे फांसा ॥ जब जिव रोग सोग तन छावै । सबही अंग छीन है जावै ॥ नैन होहि कबहु नहिं छीना । सदा एकरस देखी पीना ॥ कैसहु कुशित रोग मल घेरी । ज्योति अघट्ट निरंजन केरी ॥

( १९७४ )

बोधसागर

६६

अंधी आंख निरंजन जूझे । विन देखे मुनि सब कछु बूझे ॥ ताते साधु प्रथम दृग बांधे । पीछे मन इंद्दीको साधे ॥ श्रवणको ऐसे कीजै दमना । अनमुनती बातें मति मुनना ॥ चुगली चाई निंदा वानी । सुने न श्रवण जीव जो ज्ञानी ॥ महा प्रबल इंद्दी हैं येही । जीवहि दुःखसुख व्यापे जेही ॥ गुरुपदेश कि कथा बताया । जीयत कैदी हाड तोडाया ॥ देखन ताहि जुरे नारीनर । एक गर्भिणी रहे तिहि ठाहर ॥ कैदी हाड लगा जब टूटे । निरखि गर्भिणी धीरज छूटे ॥ फिर देखी जब लोग लोगाई । सबही निजुनिजु भौन सिधाई ॥ निजघर जाय गर्भिनी बाला । कैदी सुरति कीन कछु काला ॥ मुनि ताको दोन्हो बिसराई । गर्भ कि थित सरनता पाई ॥ जन्मौ पुत्र तिहि औसर नारी । ता शिशुकी यह दशा निहारी ॥ कैदी अस्थि टुटी रह जेतो । बालक हाट टुटा सब तेतो ॥ हस्पताल सो शिशुले गयऊ । बीसवर्ष लो जीअत रहेऊ ॥ टूटा हाड़ बाल सो जीया । औषध ताहि न कछु गुनकीया ॥ मातु दृष्टि बालक दुःख पाया । गर्भहि निजु हाड़ तोड़ाया ॥ ऐसो नैन महाबलवाना । व्यासदृष्टि सुत तीनउपाना ॥ ऐसहि श्रवन प्रबलकहि गानो । एकबारकी कथा बखानो ॥ बंधा परा रहै जिहि ठाई । एक कलावत तहैं चलि आई ॥ गावन और बजावन लागा । सुनते बौरा मन अचुरागा ॥ बौरा रागको भेदी रहई । मुनि सुर ताल प्रीति अतिगहई ॥ परे परे निज अंग हलावै । ज्यों सुरताल कि गतिसुनि पावै ॥ परे परे निज अंग हलावै । खाट से खोलि दियौ पुनि वाको ॥ गुंगे बहिरे चंगे होई । श्रवण नयन हारे ते जोई ॥

६७

जीवधर्मबोध

( १९७५ )

प्राण देत मृग मधुरीबानी । ऐसहि प्रबल नासिका जानी ॥ इंद्री सकल अकलको हरही । ले सब जिव भवसागर भरही ॥

इति नेत्र श्रवण दमन

अथ हाथ पांवको दमन-चौपाई

उत्तर कर्म करनते कीजै । काहूको मति दुःख कछु दीजै ॥ पंथमें पाहन कंटक होई । करते दूर डार गह सोई ॥ दान पुन्य हाथन ते करिये । दुःखी दीनको सुखते भरिये ॥ मन्दे कर्मन हाथ उठाये । परधन परतिय दिस न चलाये ॥ चरननको यह कर्म बखाना । हरितीरथ सतसंगत जाना ॥ संतदरस रोगी सोगी पह । यथा योग चलके दुःखदलतह ॥ हरुये हरुये महि पग धरई । देखत चले न जिव कोइ मरई ॥ लाखन जिव पायनतर आवै । दाया करिके तिनहि बचावै ॥

इति हाथ पांवको दमन

अथ श्रेष्ठ पुरुषनकी सभा प्रवेश वर्णन-चौपाई

श्रेष्ठ सभामें जब पग दीजै । तहैं सब कर्म विचारते कीजै ॥ सभामध्य जेहिँ औसर पैठे । आज्ञा पाय तहां तब बैठे ॥ त्रिन बोले नहिँ बोलो बोला । बिन पूछे कछु भेद न खोला ॥ बुद्धि विरुद्ध न बोलो बानी । जाकी कोई प्रतीत न आनी ॥ बहुत बड़ाई अस्तुति छोड़ो । निंदा चुगुलीते सुख मोड़ो ॥ कबहुँ न निजगन बुद्धि सराहा । दुःखमतिभाषो सभा उच्छाहा ॥ ऐसो वचन कहो जनि ताही । मनभायक नरनायक नाही ॥

इति सभाप्रवेश

अथ मद्यमांस अभक्ष्यवर्णन-चौपाई

मद्य मांस भक्षमलिनबखानी । ताहि न ग्रहन करे नर ज्ञानी ॥ निज निजहृदय विचारो येहा । मल अरु मूत्र कि जेती देहा ॥

( १९७६ )

बोधसागर

६८

सकल अभक्ष धिनावन सोई । चहुँ खानि जलमलते होई ॥ शुद्ध अशुद्ध ताहि पहिचानी । जलकृत शुद्ध अशुद्ध मलानी ॥ मलकृत जो जिव जंतु उपाये । हो अज्ञान ताहिके खाये ॥ जलकृत जो फल अन्न अंकुरा । ताते भूखको दुःख कर दूरा ॥ नरपशु जीव जंतु खग नाना । सबको दुःख सुख एक समाना ॥ नरपशु खग जो मासके भक्षक । सो नहिं कबहु जीवके रक्षक ॥ जिनके हृदये दाया नाही । सोई अधोगति मांह समाहीं ॥ मांसु अहारीके कस दाया । एकखाय बहु मारि गिराया ॥ जो कोई काहूको दुःख देहै । बदला तासु आप शिर लेहै ॥ सुरापान अरु मांसु अहारी । नरकधाम सो अवश्य सिधारी ॥

सत्यकबीर वचन

साखी-कबीर-मासुअहारीमानुवा, परतख राक्षस जान ।

ताकोसंगत मतिकरो, होयभक्तिमें हान ॥

कबीर-काजी को बेटा सुवा, उरमें सालै पीर ।

वह साहिब सबको पिता, भला न मानै वीर ॥

कबीर काटाकृटि जे, करे यह परखण्डको भेस ।

निश्चयराम न जानही, कहै कबीर संदेह ॥

कबीर-करता हूँ कहि जातहो, कहा जो मान हमार ।

जिसका गलातुकाटिसो, फिर गलाकाटितुमार ॥

चौपाई

मुसलमान आदिक ईसाई । कबहु मदामि अशुचि बताई ॥

ईसाइनमें एक जमाती । अमली नहिं बैठे तिन पाती ॥

अथ टेम्पेरिस मुसैटीको वर्णन-चौपाई

टीटो टलर मुसैटी नाऊ । टेम्पेरिस बहुरी बतलाऊ ॥

दोऊ नाम अंगरेजी भाषा । अमल त्यागियोंकी यह सापा ॥

६९

जीवधर्मबोध

( १९७७ )

जगमें जेते अमलको नामा । तिनके लेखे सकल हरामा ॥ तिहि मंडली मिलै जो कोई । यह सौगंध करावे सोई ॥ आजते कौल करार हमारा । कोई अमल मुखमें नहीं डारा ॥ आप न खाय न औरहि देही । नहीं बेचै न बेचावै येही ॥ कबहुँ न करे तासु व्यौहारा । अमल निकट नहीं निजु पगधारा ॥ जो कोइ ऐसो नियम गहावै । कागज परवाना लिखपावै ॥ सो परवाना निजु ढिग राखे । मूलि कबहुँ कछु अमल न चाखे ॥ जिनके मते ग्रंथ बहुतेरा । विषहू ते विष अमल बडेरा ॥ सबही अमलकि निंदा करही । टीटो टलर धर्म आचरही ॥ जो कोइ क्रियामें होय न पक्का । तेहि जमातिसे पावै धक्का ॥ यूरुम नर केते यहि माही । टीटो टलरको धर्म धराही ॥ सुसलमान साधू बहुतेरे । मांसअहार कबहु ना हेरे ॥ धर्म अहिंसा सम नहीं आना । वेदविदित सब संतन जाना ॥

नानकशाह वचन

क्या बकरी क्या भेड है क्या आपन जाया । रक्तमासु सब एक है तुके किन फरमाया ॥ नानक घट परचै भई सबही घट पीरा ॥ सकलजत्तके आतमा महबूब कबीरा ॥

इति मयमांस अमल सर्वथा अभक्ष

अथ विचार जीवहितकारी वर्णन

कवित्त-बोलत विचार कर डोलत विचार कर सुक्तिद्वार पालन विचार सरदार है । बैठत विचार कर उठत विचार कर हाट बाट घाटहू विचार घरबार है ॥ योगहू समाधि माँह ज्ञानहू अगाध माँह साथक अरु सिद्धको विचार सब सार है । रनवन घन यज्ञदान सुमिरन महँ जहँ तहँ देखिये विचार जिव तार है ॥

( १९७८ )

बोधसागर

७०

सोरठा-जीवधर्म है येह, बारहि बार बिचार कर । मैं कह कह मम देह, केहि कारण फंदेशरा ॥

चौपाई

करत बिचार होय उजियारा । तेहि प्रकाश निज दोष निहारा ॥ जब आपनो दोष लखि लीजै । तासु नाश हित उद्यम कीजै ॥ स्वसंवेद वद भेद अनूषा । प्रथमै जिवको सत्य स्वरूपा ॥ सो सब प्रथमहि कहे बखानी । जाते जीव अमै चहुँ खानी ॥ अपने फन्दमें आप फँसाई । आपै आप रहा भरमाई ॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

अपनेको आपही बिसरो ।

जैसे श्वान काँचि मंदिरमें भर्मत भूसि मरो ॥

ज्यों केहरि वपु निरखिकूप जल प्रतिमा देखि परो ।

ऐसेही गज लखि स्फटिकशिलामें दूरसन हीते अरो ॥

मरकट मूठी स्वाद न छोड़ै घर घर रटत फिरो ।

कहै कबीर नलनिके सुगना कौने तोहि पकरो ॥

दोहा-मनकी वृत्ती पंच है, प्रथम कहे परमान ॥

बीपरजयो विकल्पकह, निद्रास्मृति मान ॥

चौपाई

मनकी वृत्ती पंच उच्चार । मनहीको है सकल पसारा ॥

सुन स्वरूप भर्म यह मन है । तेहि कारण सब योग जतन है ॥

मन बिनसात जक्त बिनसाना । अंडर्पिंड दोउ शून्य समाना ॥

जड़ शरीर चेतन चित्त संगा । कर्म फन्द जिव ज्ञान विभंगा ॥

जड़चेतन जन होय मिलौनी । दुःखसुख भोगे सुर नर मौनी ॥

द्वंद्वते परा जीव को धोखा । कौन भांतिसे पावै मोखा ॥

जिव निरद्वंद्व दोहू ते न्यारा । सत्य स्वरूपी अगम अपारा ॥

७१

जीवधर्मबोध

( ११७१ )

पांच तत्त्वको जानन वारा । सदा सो इन पांचोंते न्यारा ॥ मन इन्द्री निरगुनते पारा । आप भूलि गल फन्दा डारा ॥

सोरठा-फन्दपरा जब जीव, अपनो रूपबिसारके । दृढन लागा पीव, विविधि प्रकारकी यतनकरि ॥

चौपाई

जिमि कपिकण्ठलगी जंजीरा । बँधा रहै बांसके तीरा ॥ कबहुंके बांस ऊपर चढ़ि आवै । कबहुंके हेठ उतरि सो आवै ॥ उतरा चढ़ि न छूटै ताकौ । दृढ़ जंजीर परी गल वाको ॥ तिमि जिव कमहीक्रम लहदेही । बिनसतगुरु पद पाव न येही ॥ जब जंजीर गलेकी छूटै । तब जिवरूप आपनो जूटै ॥ वपु विज्ञान शिखरकी चोटी । देही थूल मूल महि मोटी ॥ मूलते जब चोटी चढ़ि जावै । निज प्रतिबिंबै ध्यान लगावै ॥ ऊपर हेठ लख मोर स्वरूपा । झाँई भेद न जाने गुपा ॥ यही देहु विज्ञान कहावै । झाँई निरखि अपनको गावै ॥ जैसे तप्त तीख अंगारा । पर ताहीपर क्रमक्रम छारा ॥ ज्ञान अग्नि जब अन्त बुझाई । थूल शरीर बहुरि जिव पाई ॥ पुनि करि यत्न अग्नि उदगारा । तब विज्ञान देह सौ धारा ॥ होय जाय इमि कालहि पाई । आवागौन सूत्र नहि जाई ॥ जब कपि कंठ कड़ी गुरु छोरै । तब भ्रम धोखा होय न भोरै ॥ बन्धन सो विज्ञान कि देही । आवागौन न छूटै जेही ॥ इहां लगि वेद पुरान बखाना । आगे मरम न कोई जाना ॥ दशों दिशा दश सूरज होई । तब छाया नहि दूरसै कोई ॥ छाया माया होय विनाशा । जीवहि निजुस्वरूप तब भासा ॥ दशों दिशा जब रवि खरधारा । प्रलय होय तबही संसारा ॥ जहँ संसार तहाँ नहि ज्ञाना । जहाँ ज्ञान तहँ जक्त नसाना ॥

( १९८० )

बोधसागर

७२

जबलों पारख पद नहिं पावै । तबलों आवागौन समावै ॥ ताते मनहिं विचार करीजै । कच्छी तत्त्वदेह किमि छीजै ॥ पक्की तत्त्व बहुरि जिहि पैये । कह संग्रह कह त्याग करैये ॥ पांचो तत्त्व पचीस प्रकृती । भर्म रूप सबही ये बर्ती ॥ जाग्रित स्वप्न सुषुप्ति तुरिया । सो सब भर्म भावकी पुरिया ॥ जैसे जीव त्याग निज भूमी । चार खानिमै रहा सो झूमी ॥ ब्रह्मजीव जग दीसो माया । इत्यादिक बहु नाम धराया ॥ तैसे स्वसंवेद की बानी । धरि बहुरूप जक्त बिहरानी ॥

इति

अथ तत्त्वमसि तीनोंपद मिथ्यावर्णन-चौपाई

जान ज्ञान द्वैभेद बखाना । स्वसंवेद अस करे प्रमाना ॥ मलसंयुक्त ज्ञानको वरना । सर्वजीवमें सो संचरना ॥ ज्ञान अमल विकार कहावै । ज्ञानहि मात्र जीव बतलावै ॥ मेघ झंप जिमि भानु लोपाई । मुख न दीख दरपन लगिकाई ॥ तैसे जान भर्मकी ओटा । सत्य न भासै भासै खोटा ॥ पौन प्रसंग पटल घन बूरी । स्वतह भानु बहुडिस रह पूरी ॥ भानुउदय नहिं दरसै तारा । ज्ञानउदय नहिं यह संसारा ॥ अमल अखंड उदय दिनकरके । रहे न भर्मत तच्छन सरके ॥ जानति माया झंपन जबही । ज्ञान नाम कहिये सो तबही ॥ ज्ञानहि मात्र जीवको कहई । विना ज्ञान सब भूत्तक अहई ॥ जक्त मांह जेते वैपारी । जीव जमावै पार पसारी ॥ बिना जमावै पार न होई । खर्च कहांते करिहै कोई ॥

सत्यकबीर बचन

सारसी-कहै कबीर विचार, यह निर्णय परमान । जीव जमा जाने बिना, सबै खरचमें जान ॥

७३

जीवधर्मबोध

( १९८१ )

चौपाई

जो दीसै सबही विनसाई । जो विनसै सो जिव न कहाई ॥ जीव सोई जीवै तिहुकाला । जड़ चेतन ते सदा निराला ॥ आप मानि बंधनमें आया । भ्रमकरि तत्त्वमसी ठहराया ॥ तत्त्वमसी तिहुँपद है जोई । आवागौन मूल है सोई ॥ ततपद ईश्वर त्वं जिवरासी । असि पदक है ब्रह्म अविनासी ॥ ततपद ज्ञान है त्वं अज्ञाना । असि पद वेद ब्रह्म अज्ञाना ॥ वस ब्रह्मांड ब्रह्मसो ईसा । जिव अभिमानी पिंडमें दीसा ॥ असि पद जो दोनोंमें सनई । यमअनंद कछु कहत न बनई ॥ ज्ञानी अज्ञानी विज्ञानी । ततसागर त्वं सर असि पानी ॥ नामरूप मिथ्या है दोई । आत्मा एक जल सबमें सोई ॥ मानन्दी यह तीन प्रकारा । मानि मानि निज बन्धन डारा ॥ यही तीन है जिवको फांसा । षट्देहीमें कीनो बासा ॥ दोविधि ज्ञान द्वैविधि अज्ञाना । दोय भांति विज्ञान बखाना ॥ यक विशेष अपरोक्ष बतावो । दुतियोको परोक्ष कहि गावो ॥ निर उपाधि अपरोक्ष बखाना । सहित उपाधि परोक्ष प्रमाना ॥

इति

अथ त्वंपद द्वैभांतिको अज्ञानवर्णन-चौपाई

जो विशेष अपरोक्ष कहावै । विषयी जीवनके मन भावै ॥ विषय आसक्त जीव जब रहई । जाति पांति कुलकानि न गहई ॥ भोग मदामिष परतिय संगा । विषयिन सङ्ग अनंग तरंगा ॥ वेद शास्त्र मानै नहीं कोई । गति अपरोक्ष कहावे सोई ॥ सो अपरोक्ष दोय विधि वरना । परइच्छा निज इच्छा चरना ॥ परइच्छा जो हो अज्ञाना । सो समान अधिकरण बखाना ॥ निज इच्छा अज्ञान गहीजै । सो विशेष अधिकरण कहीजै ॥

( १९८२ )

बोधसागर

७४

गुरुजनकी कछु कानि न माने । वेद शास्त्रकी निन्दा ठाने ॥ गुरु सतगुरुको आदर नाही । ईश्वर देव कौन कह आहीं ॥ वामपंथ इच्छा आचरई । बाद अन्यथा सबसे करई ॥ जो कोइ ताको ज्ञान सुनावै । ताते उठिके झगरन धावै ॥ रस शृङ्गार गीत भल गावै । विषय सराह स्वाद मन लावै ॥ निंदै ज्ञान भक्ति सतसंगा । सदाकाल विषयन रतिरंगा ॥ मृगनैनी तजि भे बैरागी । इन समान नहिं कोउ दुर्भागि ॥ साधु संग करि नर बौराना । ताते विषय स्वाद नहिं जाना ॥ कर्महीन दारिद्री येहा । हम ज्ञानी सब गुनको गेहा ॥ जो कछु है सो है यह देही । इन्द्री भोग देह भल हेही ॥ मुये पिछार मुक्ति सब पाई । और सबहि जग भ्रम उपजाई ॥ जैसे वृक्षते पत्ता टुटता । फेर न सो तरुवरमें जुटता ॥ जैसे मुये मुक्त सब होई । और मुक्ति कतहुँ नहिं कोई ॥ यह बिसे अपरोक्ष अज्ञाना । विषयी जीवनके मनमाना ॥ अब दुतियेको वरनन कीजै । तेहि परोक्ष अज्ञान कहीजै ॥ सो परोक्ष अज्ञान है जोई । समान अधिकरन कहावे सोई ॥ जो समान अधिकरन कहावै । कर ताको दूजा बतलावै ॥ यंत्र मंत्र अरु देवी देवा । विविधि प्रकार करे सो सेवा ॥ तीरथ व्रत अस मूरत पूजा । कर्म करहि ईश्वर लखि दूजा ॥ वेदकि विधि सब करे अचारा । क्रम उपात्ताको व्यौहारा ॥ कर्मोमाह दोय विधि जाना । यक विशेष कह एक समाना ॥ मुन धन धान्यलाभ जग हेता । पूजा सेवामें चित देता ॥ निज मनोर्थहिन जो मन लावै । सो विशेष अधिकरण कहावै ॥ कर्ता हेत कर्म जो करिये । मुक्ति वासना चितमें धरिये ॥ शम दमादि अरु योग समाधू । तन मन बहुविधि साधे साधू ॥

७५

जीवधर्मबोध

( १९८३ )

यही कर्म भक्तन मन भावै । कोइ बड़भागी तेहि मन लावै ॥ नाम समान तासुको धरते । सुक्तिवासना जिवमें बरते ॥ दोय प्रकार कहे अज्ञाना । अकरम करम करै विधिनाना ॥ अकरम सकल अकरमी केरा । करमिष्टी कर कर्म घनेरा ॥ परइच्छा निज इच्छा होई । समान विशेष कहावै सोई ॥ याहीको त्वंपद कर जानी । तामें बैँधे सकल अज्ञानी ॥ द्वै प्रकार अज्ञान उचारी । तामें फँसे सकल संसारी ॥

इति त्वंपद अज्ञान

अथ ततपद द्वैविधिको ज्ञानवर्णन-चौपाई

ततपद द्वै विधि कह सविवेका । एक विशेष समान है एका ॥ सहित उपाधि विशेष बखाना । निरउपाधि है मुक्त समाना ॥ ज्ञान विशेष ते ईश बखानी । ज्ञान समान कहावै ज्ञानी ॥ निज जनकी उपाधि सब जाना । पर उपाधि सबही पहिचाना ॥ तीन अवस्था दुःख सुखसारा । इन्द्री अरु इन्द्रिन व्यौहारा ॥ सब मिथ्यामृगजलवत जाना । सब असत्य मैं सत्य सुजाना ॥ तीन देह माया भ्रम माना । बारम्बार फुरै अज्ञाना ॥ सोई ज्ञान परोक्ष प्रमाना । ताहूमें द्वै भेद बखाना ॥ सर्व समर्थ गहे सब सत्ता । ऋद्धि सिद्धि युत जगमें वर्त्ता ॥ जो षट्गुन ईश्वर जग होई । सोई सिद्धि ईश कह सोई ॥ होनी अनहोनी करि डारा । अब समान करिये निरधारा ॥ निरउपाधि कहियत है ताही । ऋद्धि सिद्धि कछु मानत नाहीं ॥ सकल उपाधि नास्ति करिभाषी । मैं आस्तीक सर्वको साखी ॥ त्रिगुणातीत मोर व्यौहारा । विधि हरिहर नहि पावत पारा ॥ ऐसो ज्ञान जाहिके तीरा । सोई ज्ञानी ज्ञान गंभीरा ॥ यह परोक्ष द्वैविधि चितधरिये । अब अपरोक्षकि निर्णय करिये ॥

( १९८४ )

बोधसागर

७६

तीन काल कोई नहिं भासा । त्रिपुटी सकलको होय बिनासा॥ ज्ञानाज्ञान गेय नहिं कोई । ध्याता ध्यान ध्येय ना होई ॥ आपन भाव रहै तिहुँ काला । द्वैत उपाधि नास्ति जंजाला ॥ यही ज्ञान अपरोक्ष कहावा । सो ज्ञानी शिवरूप बतावा ॥ योग समाधिसे जो मन मारे । मध्यम पक्ष सो वेद उचारे ॥ तामे कसर वेद निर्धारा । परो अविद्याको अंधियारा ॥

इति तत्पद

अथ अस्तिपद विज्ञान द्वैविधि वर्णन चौपाई

जानि बूझि जड़ वृती जो धारा । जस उनमत्त महा मतवारा ॥ यहिविधि सहजदसा जब गहई । एक अनेकन भ्रम कछु रहई ॥ महदानन्द मगन मन होई । याहूमें प्रकार है दोई ॥ जहँ विज्ञान दशा रह आई । सो विज्ञान हंस कहलाई ॥ कहवे मात्र बानीको ज्ञाना । सो मिथ्या विज्ञान बखाना ॥ दुतिये सो विज्ञान कहाई । जहां तहां आपै रह छाई ॥ द्वैतभाग कहुँ नहिं रहई । कारन कारज आपै रहई ॥ आपै बोले आप बोलावै । आपै डोलो आप डोलावै ॥ करे करावै आपै आपू । द्वैतभाव कतहुँ नहिं थापू ॥

इति

अथ स्वसंवेदमते चतुर्थपारखपदवर्णन-चौपाई

यहि विधि तीन भूमिका भाषी । चौथि भूमि पारखपद राखी ॥ तीन भूमिका है भ्रम भासा । चौथे परख काटे जिव फांसा ॥ तत्त्वमसीको ज्ञान जो गहता । तावमसीसे न्यारा रहता ॥ जैसे गुँगेने गुड़ खाया । बाक बिना कह स्वाद बताया ॥ तत्त्वमसाको ज्ञान जो धारी । जानि बूझि सो भयो सुखारी ॥ गुंगा गुड़को स्वाद जो गहई । सो तो गुड़से न्यारा रहई ॥

७७

जीवधर्मबोध

( १९८५ )

स्वादी स्वादसे भिन्न सदाई । क्या गूँगा गुड़ही है जाई ॥ नयन समस्त जत्तको देखे । अपनो रूप न सो पै पेखे ॥ मुखको भास परे दरपनमें । पै मुख नहीं विचारो मनमें ॥ तत्त्वमसीगह ज्ञान जो कोई । अपनो भास आपना होई ॥ झाँई निरखी भूलि सो जाई । ताहीको आपा बतलाई ॥ जाते आवा गौनमें रहई । पारख बिना न सो पद लहई ॥ सब ऊपर गुरु पारख पद है । यह जीवके ज्ञानको हद है ॥ घट प्रकारकी भूमि कहावै । पारख गुरु सकल परखावै ॥ छिप्रा प्रथम गतागत दोई । तृतीये सो लेष्टा कह सोई ॥ चौथी भूमि शूलनी गाई । पंचम भूमि आप भौराई ॥ छठई सत्य भूमि कहि दीजै । सप्तम पारख भूमि भनीजै ॥ पारख पा कोइ पद नहीं जाना । ताकी कृपाते भय भ्रम भाना ॥ पारख बिन जीव यह भूला । ताते सहे त्रिविध तन शूला ॥

सत्यकबीर बचन—शब्द

यह जग पारख बिना भूलाना । निर्गुण सर्गुण द्वै कर थापै अजपा धरि धरि ध्याना ॥ द्वैतहि ब्रह्म सकल घट व्यापै निर्गुणमें लपटाना । आवै जाय उपै फिर बिनशै जरि मरि कहा समाना ॥ सहस पाखुरी कमल विराजै मन मधुकर लपटाना । जलके सूखे कमल कुमिलाना तब कहु कहा ठेकाना ॥ छवो चक्र व्रत चार चतुर्दश वेद मते अरुज्ञाना । बंक नालकी डोरी खैंचे योगिन युक्ति बखाना ॥ घटमें करता लोग बोलत है पाँचों तत्त्व बीलाना । सर्गुन विनशी निर्गुन गुन रहि तमगुन बिन कहाँ समाना ॥

( १९८६ )

बोधसागर

७८

करहु विचार सकल मिलि ऐसो भेष विविधि बिधि बाना । कहै कबीर कोइ गुरुगम पावै पहुँचे ठौर ठिकाना ॥

इति पारखभूमि

सोरठा-ज्ञानको मूल विचार, बिन विचारको ज्ञान गह ।

हृदय घोर अँधियार, सार असार न परखकर ॥

ताते बारहि बार, मनमें भूले विचारकर ।

कोहें को संसार, कौनि भाँति कहते भया ॥

करता कारण कौन, यह समूह जो दृश्य है ।

परखी लीजिये तौन, निज विचार द्वारे सकल ॥

देह सदा जडरूप, चित्त फुरित चैतन्य है ।

कर्मकिया भ्रमकूप, जड़ चैतनते मैं अलग ॥

चौपाई

अस विचार आवै हिय जनही । तब गह सार भर्म भय भनही ॥

जहैं लगि जगमें कथा कहानी । सकल जीवकी बात बखानी ॥

सर्वज्ञौ अलपज्ञ समाजा । जीवहि रंक जीव ही राजा ॥

जीवहि गिरही जीव भिखारी । जीवहि पुरुष जीवही नारी ॥

जीव ब्रह्म माया जगदीशा । जीवहि स्मर लक्ष्म रजनीशा ॥

जीवहि क्रूर सुगम सुरबाना । जीवहि जल थलमें बिहराना ॥

जीवहि काल युवा अरु बूढ़ा । जीवहि ज्ञानी जीवहि मूढ़ा ॥

जीव समष्टि व्यष्टि कहलावै । जीवहि पोषै सोष उपावै ॥

जीवते इतर कतहुँ कछु नाहीं । उर्थ मध्य अथ जीवहि आहीं ॥

जीवको सबहीं खेल विहारी । ताकी दशा अवस्था न्यारी ॥

ब्रह्म कहूँ बिन जीव न होई । जीव बिना जिव जिये न कोइ ॥

जौपै ब्रह्म जीव बिन होता । कैसे जीव बीज सो बोता ॥

जीवकर्म निर्जीव न करई । जीव बिना जिवकाज न सरई ॥

७९

जीवधर्मबोध

(१९८७)

जीवभूमिका पर सब ठाढ़े । कहूँ तुच्छ कहूं गुणगण बाढ़े ॥ कर्म किये सर्वज्ञ हो सोईं । जैसे मूरख पंडित होईं ॥ सम्पति विपतियें जिव एक सारा । भिन्न भिन्न पदवी सो धारा ॥

दोहा-अल्पज्ञता जो जीवकी, सर्वज्ञता जो ईश ।

दूर दोहूको कीजिये, जीवहि विश्वा वीश ॥

चौपाई

चारों खानि जीव यक रासी । सबको लगी कर्मकी फांसी ॥ नरतन यही ज्ञान अधिकारी । ताते जीव भ्रम तिभिर बिड़ारी ॥ कञ्चनको भूषण बहु करही । न्यारो न्यारो नाम सो धरही ॥ भूषणदशा स्वर्ण जब लहिये । तब क्या कंचन नाम न कहिये ॥ धातु रूपहू कहिये कंचन । भूषणहू पुनि सोईं विरंचन ॥ कंचन आहि सत्य यक ताते । जो कछु चाहे रचिये बातें ॥ ऐसे जीव धातुसे सब है । माया ब्रह्मादिक बहु ढब है ॥ सांचो जीव जमा यक अहई । और खर्च बहु बानी बहई ॥ सूक्ष्म थूल जीवकी करनी । अज्ञ तज्ञ कछु भिन्न न वरनी ॥ पारख गुरु कोइ दूँदन जावै । जीवते इतर ताहि नहिं पावै ॥ पारख सदा जीवके पाहीं । प्रकट होत भ्रम तम बिनसाहीं ॥ भल विचार करिहैं जे प्रानी । सारासार सोईं पहिचानी ॥ जेते हंस पारख पदधारा । पारख पाय न पुनि संसारा ॥ अलख कि गति कहूँ लखी न जाई । पारख कृपाते सो दरसाई ॥

सत्यकबीर बचन-शब्द

साधो सतगुरु अलख लखाया, जाते आप आप दरसाया ॥ बीज मध्य ज्यों तरुवर दरसै, वृक्ष मध्य ज्यों छाया । आतममें परमातम दरसे, परमातममें माया ॥

(१९८८)

बोधसागर

८०

ज्यों नाभीमें शून्य देखिये, शून्य अण्ड आकारा । निहअक्षरसे अक्षर ऐसा, क्षर अक्षर विस्तारा ॥ ज्योंग्विमध्ये किरन देखिये, किरनि ज्योति परकाशा । पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, जीवब्रह्मसे श्वासा ॥ श्वासामध्ये शब्द देखिये, शब्द अर्थके माहीं । पारब्रह्मसे जीव ब्रह्म है, न्यारा है वह साईं ॥ आपै बीज वृक्ष अंकुरी, आप पुहप फल छाया । सूर्य किरन परकाश आप है, आप ब्रह्म जिवमाया ॥ आतममें परमातम दरसै, परमातममें झाँई । झाँईमें यक झाँई दरसै, लखो कबीरा साईं ॥ छन्द-यह ज्ञान अगम अगाध कोई साधके मन भाय है । सो परख पारख परम गुरुकह परख पद परखाय है ॥ परखाय है सो परखपद जब दयानिधि हर्षाय है । सत्यनामके परताप पर्वल ताप त्रिविध नसाय है ॥

इति

अथ पंचकोष मिथ्यावर्णन—चौपाई

आप भूलि निजु फांसा लीना । पंचकोषमें बासा लीना ॥ पंचकोष यहि विधि पहिचानी । प्रथम अन्नमय कोष बखानी ॥ दुतिय प्राणमय कोष प्रमानो । तृतीय मनोमयकोषको जानो ॥ पुनि विज्ञान मय कोष अहई । फिरि अनंदमय पंचम कहई ॥ प्रथम अन्नमय कोष बखानो । अन्न भोगते ताथित मानो ॥ पंचतत्त्व परकृत पचीसा । तीनों गुन करि जिवतन दीसा ॥ जैसे घटको भाजन ठाटी । उपादान कारन है माटी ॥ तासु निमित्त कारन कोम्हारा । समवाय कारन चक्र विचारा ॥

८१

जीवधर्मबोध

( १९८९ )

तिमि तम उपादान कारनतन । राजसतामसनमित्तको कारन ॥ सातकसो समवाय बखानी । तीनों गुन करि देह उपानी ॥ सो तन कहे अन्नमय कोषा । बंधन ताहि चार है चोखा ॥ बसियौ रसियौ असियौ कसियौ । ये चारों बंधन तन लसियौ ॥ प्रथमें बसियो कहो बखानी । देहोहं यह तन मम मानी ॥ देहको सो आपा करि जानी । बंधन माह परा अज्ञानी ॥ दुनियौ रसियौ भेद उचारी । जेहि वर्णाश्रम जिव तनधारी ॥ सोइ वर्णाश्रम कर्म जो करिये । तेहि ते रसियौ बंधन परिये ॥ तृतिये असियौ कहिये ताही । निजु वर्णाश्रम जीव सराही ॥ तुच्छ इतर वर्णाश्रम देखे । बंधन असियौ गहे विशेषे ॥ चांथे कसियौ करे अकाजा । कुलकी लाज लोककी लाजा ॥ वेद अरु देव लाजामें फँसा । ताते परा जीवको संसा ॥ इन चारों बंधनको काटो । तब जिवकी अम संशय फाटो ॥ कुल अरु लोक वेद सुर लाजा । अस जब भाषे कुटुम समाजा ॥ हमरे कुलको यहि पथ डगरा । कुलकरनी तजि तू जस बिगरा ॥ तब जिव दुरि कुलधर्म सभारी । भित्रपंथ नहि सो पगधारी ॥ जो कोई यह लजा काटे । लोकलाज पुनि ताको डाटे ॥ लोग जो ऐसी बचन सुनायौ । बिगन्यौ श्रेष्ठ पुरुषको जायौ ॥ लोकलाज तब जिव नहि छोड़े । अपने कर्म ते सो मुख मोड़े ॥ लोक लाज जौ तोरके जाई । वेद लाज तेहि लेत फँसाई ॥ वेद लाज सो बंधन अहई । जब संसारी अस मिलि कहई ॥ काहू वेद शास्त्र परमाना । जो तू कर्म करे मनमाना ॥ वेदहु लाज लंघि जब जावै । देव लाज पुनि तोहि दबावै ॥ देव लाज कह कौन उलंघा । करे देव करनीमें भंगा ॥ इन्दी द्वारे देवन थाना । विषय भोग तिनके तन माना ॥

( १९९० )

बोधसागर

८२

आवत देख जो विषयबयारी । इन्द्री पटल सो देहि उघारी ॥ विषयानन्द जीव जब होई । तब शुभ करनी करे न कोई ॥ जब चहुलाज लंघि जिव जावै । बड़भागी कोइ प्रभु पद पावै ॥ अन्नमय यह कोष बखाना । जामैं जक्त जीव गल ताना ॥ प्राणमयी कोष याके आगे । विविधिप्रकार पौन संग लागे ॥ प्राण अपान समान उदाना । व्यानो नाग कूर्म कहि गाना ॥ किर्कल देवोदत्त धनंजय । ये सब पौन हैं कोष प्राणमय ॥ जेहि औसर जिव ऐसो कहई । प्राण हमारो तीक्ष्ण बहई ॥ प्राण पौनको स्वतह सुभाऊ । आपासो आरोप कराऊ ॥ गुदा अपान प्रवेश कराया । पवन सुभावन जीव सुभाया ॥ हृदय समान उदान सिरोई । व्यान अन्नपाचक है सोई ॥ नाग डकार कूर्म हग खोले । किर्कल छीक स्वतह सो बोले ॥ देवदत्त जसुहाई पूजै । मृतक शरीर धनंजय सूजै ॥ इतने इतर पौन बहुवादी । अंगफर्कन अफरन हिचक्यादी ॥ पौन कर्म सब मानै आपा । कोष प्रानमय बंधन थापा ॥ कोष मनोमय तासु अवांतर । पुनि हंकार कहे ताते पर ॥ शुभ और अशुभकर्म जो कछु कर । पुन्य पाप व्यौहारादिक नर ॥ सो सब मन इन्द्रीके करतब । कोष विज्ञानमयी कहिये अब ॥ पंच ज्ञान इंद्री छठये बुधि । तासु अवांतरचित्त सहित सुधि ॥ परमारथ सब उत्तम करनी । सो सुभाव सब इनको बरनी ॥ जिवसो कर्म आपनो धरई । कोष विज्ञानमय बंधन करई ॥ पुनि अनंदमय कोष पर तेही । बुद्धिको ऐसो ज्ञान भयो जेही ॥ हौमैं करि जिव करे बखाना । आपको बड़ अनंद हम जाना ॥ सो अनंद बंधन जिव केरा । कोष अनंदमयी यह टेरा ॥ पांचो कोष अवस्था पांचो । जागृतरूप अनन्तमय बांचो ॥