भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 2055, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2055

६९

जीवधर्मबोध

( १९७७ )

जगमें जेते अमलको नामा । तिनके लेखे सकल हरामा ॥ तिहि मंडली मिलै जो कोई । यह सौगंध करावे सोई ॥ आजते कौल करार हमारा । कोई अमल मुखमें नहीं डारा ॥ आप न खाय न औरहि देही । नहीं बेचै न बेचावै येही ॥ कबहुँ न करे तासु व्यौहारा । अमल निकट नहीं निजु पगधारा ॥ जो कोइ ऐसो नियम गहावै । कागज परवाना लिखपावै ॥ सो परवाना निजु ढिग राखे । मूलि कबहुँ कछु अमल न चाखे ॥ जिनके मते ग्रंथ बहुतेरा । विषहू ते विष अमल बडेरा ॥ सबही अमलकि निंदा करही । टीटो टलर धर्म आचरही ॥ जो कोइ क्रियामें होय न पक्का । तेहि जमातिसे पावै धक्का ॥ यूरुम नर केते यहि माही । टीटो टलरको धर्म धराही ॥ सुसलमान साधू बहुतेरे । मांसअहार कबहु ना हेरे ॥ धर्म अहिंसा सम नहीं आना । वेदविदित सब संतन जाना ॥

नानकशाह वचन

क्या बकरी क्या भेड है क्या आपन जाया । रक्तमासु सब एक है तुके किन फरमाया ॥ नानक घट परचै भई सबही घट पीरा ॥ सकलजत्तके आतमा महबूब कबीरा ॥

इति मयमांस अमल सर्वथा अभक्ष

अथ विचार जीवहितकारी वर्णन

कवित्त-बोलत विचार कर डोलत विचार कर सुक्तिद्वार पालन विचार सरदार है । बैठत विचार कर उठत विचार कर हाट बाट घाटहू विचार घरबार है ॥ योगहू समाधि माँह ज्ञानहू अगाध माँह साथक अरु सिद्धको विचार सब सार है । रनवन घन यज्ञदान सुमिरन महँ जहँ तहँ देखिये विचार जिव तार है ॥