भारतकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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( १९७८ )

बोधसागर

७०

सोरठा-जीवधर्म है येह, बारहि बार बिचार कर । मैं कह कह मम देह, केहि कारण फंदेशरा ॥

चौपाई

करत बिचार होय उजियारा । तेहि प्रकाश निज दोष निहारा ॥ जब आपनो दोष लखि लीजै । तासु नाश हित उद्यम कीजै ॥ स्वसंवेद वद भेद अनूषा । प्रथमै जिवको सत्य स्वरूपा ॥ सो सब प्रथमहि कहे बखानी । जाते जीव अमै चहुँ खानी ॥ अपने फन्दमें आप फँसाई । आपै आप रहा भरमाई ॥

सत्यकबीर वचन-शब्द

अपनेको आपही बिसरो ।

जैसे श्वान काँचि मंदिरमें भर्मत भूसि मरो ॥

ज्यों केहरि वपु निरखिकूप जल प्रतिमा देखि परो ।

ऐसेही गज लखि स्फटिकशिलामें दूरसन हीते अरो ॥

मरकट मूठी स्वाद न छोड़ै घर घर रटत फिरो ।

कहै कबीर नलनिके सुगना कौने तोहि पकरो ॥

दोहा-मनकी वृत्ती पंच है, प्रथम कहे परमान ॥

बीपरजयो विकल्पकह, निद्रास्मृति मान ॥

चौपाई

मनकी वृत्ती पंच उच्चार । मनहीको है सकल पसारा ॥

सुन स्वरूप भर्म यह मन है । तेहि कारण सब योग जतन है ॥

मन बिनसात जक्त बिनसाना । अंडर्पिंड दोउ शून्य समाना ॥

जड़ शरीर चेतन चित्त संगा । कर्म फन्द जिव ज्ञान विभंगा ॥

जड़चेतन जन होय मिलौनी । दुःखसुख भोगे सुर नर मौनी ॥

द्वंद्वते परा जीव को धोखा । कौन भांतिसे पावै मोखा ॥

जिव निरद्वंद्व दोहू ते न्यारा । सत्य स्वरूपी अगम अपारा ॥

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